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13 दिन के आंदोलन और राहुल गांधी की दखल के बाद झुकी महाराष्ट्र सरकार, आदिवासी छात्रावासों से उम्र सीमा हटाई

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई/पुणे | 26 अगस्त 2026

महाराष्ट्र में आदिवासी छात्रों के 13 दिन लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने छात्रावासों में प्रवेश को लेकर बड़ा फैसला वापस ले लिया है। सरकार ने आदिवासी छात्रावासों में प्रवेश के लिए तय 30 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा समाप्त कर दी है। इसके साथ ही 14 अगस्त को जारी वह सरकारी प्रस्ताव भी फिलहाल रोक दिया गया है, जिसमें छात्रावासों के नियमों, सुविधाओं और प्रवेश व्यवस्था में बदलाव किए गए थे।

सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब पुणे में आदिवासी छात्र और युवा लगातार 13वें दिन आंदोलन कर रहे थे। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में छात्रावासों की सुविधाओं में सुधार, प्रवेश नियमों में बदलाव और नए सरकारी प्रस्ताव को वापस लेना शामिल था। छात्रों का कहना था कि नए नियमों से आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के सामने पढ़ाई जारी रखने में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।

इस पूरे विवाद में महिला छात्रों से जुड़ा एक बेहद गंभीर आरोप भी सामने आया। आंदोलनकारी छात्रों ने आरोप लगाया कि लंबे समय तक छुट्टी पर रहने के बाद छात्रावास लौटने वाली छात्राओं से प्रेग्नेंसी टेस्ट कराया जाता है। इस आरोप ने मामले को केवल छात्रावास के प्रशासनिक नियमों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि छात्राओं की निजता, सम्मान और गरिमा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी में इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि या किसी जांच के अंतिम निष्कर्ष का उल्लेख नहीं है। इसलिए प्रेग्नेंसी टेस्ट के आरोपों को फिलहाल छात्रों द्वारा लगाए गए आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन आरोप की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाबदेही की मांग जरूर उठती है।

सरकार ने खत्म की 30 साल की सीमा

महाराष्ट्र के जनजातीय विकास मंत्री अशोक उइके ने मंगलवार को सरकार के फैसले की घोषणा की। उन्होंने कहा कि मामले पर विस्तृत विचार-विमर्श के बाद छात्रावासों में प्रवेश के लिए किसी भी तरह की आयु सीमा लागू नहीं करने का फैसला किया गया है।

यानी अब 30 वर्ष की अधिकतम उम्र की शर्त को लागू नहीं किया जाएगा। साथ ही 14 अगस्त को जारी संशोधित सरकारी प्रस्ताव को भी फिलहाल रोक दिया गया है।

यह फैसला आंदोलन कर रहे छात्रों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। हालांकि, आंदोलन की शुरुआत केवल उम्र सीमा को लेकर नहीं हुई थी। छात्रों की शिकायतें छात्रावासों में मिलने वाली सुविधाओं, प्रवेश व्यवस्था और प्रशासनिक नियमों से भी जुड़ी थीं।

राहुल गांधी ने उठाया मुद्दा

आंदोलन के बीच लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी मामले में हस्तक्षेप किया। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से इस मुद्दे पर बात की और छात्रों की मांगों पर ध्यान देने की अपील की।

राहुल गांधी ने महिला छात्रों से जुड़े कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट के आरोपों पर भी हैरानी जताई थी। उन्होंने कहा था कि लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के बाद छात्रावास लौटने वाली छात्राओं को ऐसे परीक्षण से गुजरना पड़ता है, यह जानकर वह स्तब्ध हैं।

राहुल गांधी की दखल और छात्रों के लगातार आंदोलन के बीच सरकार का फैसला सामने आया। इससे आंदोलनकारियों की एक प्रमुख मांग पूरी हो गई है।

उम्र सीमा पर क्यों था विरोध?

आदिवासी छात्रों के लिए छात्रावास केवल रहने की सुविधा नहीं है। दूरदराज के इलाकों से आने वाले आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए सरकारी छात्रावास उच्च शिक्षा हासिल करने का महत्वपूर्ण सहारा हैं।

कई विद्यार्थी आर्थिक कठिनाइयों, पारिवारिक जिम्मेदारियों या अन्य कारणों से निर्धारित उम्र में पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते। कुछ छात्रों को पढ़ाई बीच में छोड़ने के बाद दोबारा शिक्षा शुरू करनी पड़ती है। ऐसे में 30 वर्ष की आयु सीमा उनके लिए सरकारी छात्रावास की सुविधा बंद कर सकती थी।

छात्रों का तर्क था कि ऐसी पाबंदी का सबसे ज्यादा असर उन्हीं विद्यार्थियों पर पड़ेगा जिन्हें सरकारी सहायता की सबसे अधिक जरूरत है। सरकार द्वारा अब आयु सीमा समाप्त करने का फैसला इसी चिंता को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

अब बाकी मांगों पर नजर

13 दिन के आंदोलन के बाद सरकार के फैसले ने तत्काल विवाद को जरूर शांत किया है, लेकिन छात्रों की सभी चिंताएं खत्म नहीं हुई हैं। छात्रावासों की सुविधाओं, प्रशासनिक व्यवस्था और महिला छात्रों से जुड़े आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह महत्वपूर्ण रहेगा।

खास तौर पर कथित प्रेग्नेंसी टेस्ट के आरोपों पर निष्पक्ष जांच जरूरी होगी, ताकि यदि आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी तय हो और यदि आरोप गलत हैं तो स्थिति भी स्पष्ट हो सके।

आदिवासी छात्रावासों का उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़ना और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देना है। ऐसे संस्थानों के नियम विद्यार्थियों की राह आसान करने वाले होने चाहिए, न कि उनकी शिक्षा में नई बाधाएं खड़ी करने वाले।

महाराष्ट्र सरकार ने 30 वर्ष की आयु सीमा हटाकर आंदोलन की एक बड़ी मांग मान ली है। अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि सरकार छात्रावासों की सुविधाओं और महिला छात्रों से जुड़े गंभीर आरोपों पर कितनी पारदर्शिता और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ती है।

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