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मनुस्मृति की मानसिकता : राहुल पर योगी का हमला; लेकिन क्या महिलाओं की समानता की बात गलत है?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 24 अगस्त 2026

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शनिवार को पुणे में छात्रों-छात्राओं के बीच महिलाओं की समानता और स्वतंत्र पहचान का मुद्दा उठाते हुए ‘मनुस्मृति की मानसिकता’ पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि महिलाएं किसी की जागीर या संपत्ति नहीं हैं और छात्राओं को पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। इसके जवाब में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार को रायबरेली में राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वह भारत की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बदनाम करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। दोनों नेताओं के बयानों के बाद मनुस्मृति, सामाजिक न्याय और महिला अधिकारों को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक बुनियादी सवाल सामने है—क्या महिलाओं की समानता और अधिकारों की बात करना भी परंपरा का अपमान माना जाना चाहिए?

राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान का मुद्दा उठाया

पुणे के कार्यक्रम में राहुल गांधी ने महिलाओं की स्वतंत्र पहचान, निर्णय लेने की आजादी और बराबरी के अधिकार पर जोर दिया। उन्होंने ‘मनुस्मृति की मानसिकता’ का उल्लेख करते हुए पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने का आह्वान किया।

उनका संदेश था कि महिलाओं को अपनी शिक्षा, करियर, संपत्ति और जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति या अधीन इकाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मनुस्मृति और आंबेडकर का इतिहास

मनुस्मृति को लेकर भारत में लंबे समय से सामाजिक और वैचारिक बहस होती रही है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने 25 दिसंबर 1927 को महाड़ में मनुस्मृति का सार्वजनिक रूप से दहन किया था। यह घटना उनके सामाजिक न्याय और जातिगत असमानता के खिलाफ आंदोलन का महत्वपूर्ण प्रतीक बनी।

आंबेडकर का संघर्ष ऐसी सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ था जिसे वह जाति आधारित असमानता और सामाजिक भेदभाव को बनाए रखने वाली मानते थे। बाद में भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और गरिमा को नागरिक अधिकारों का आधार बनाया।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसलिए आज मनुस्मृति को लेकर होने वाली बहस केवल इतिहास की बहस नहीं रह जाती, बल्कि वह सामाजिक समानता और संवैधानिक मूल्यों से भी जुड़ जाती है।

योगी आदित्यनाथ ने राहुल पर किया पलटवार

राहुल गांधी के बयान पर योगी आदित्यनाथ ने तीखी प्रतिक्रिया दी। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, रायबरेली में उन्होंने राहुल गांधी पर भारत की परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बदनाम करने का आरोप लगाया।

योगी के बयान के बाद विवाद का दायरा और बढ़ गया है। अब सवाल यह है कि महिलाओं को समान अधिकार देने और पितृसत्तात्मक सोच की आलोचना करने को किस नजरिए से देखा जाए—क्या इसे भारतीय परंपरा की आलोचना माना जाए या संविधान में निहित समानता के अधिकार की मांग?

मनुस्मृति पर मत अलग-अलग

मनुस्मृति को लेकर समाज और राजनीति में एकराय नहीं है। एक दृष्टिकोण इसे प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था और ऐतिहासिक ग्रंथ के रूप में देखता है। दूसरी ओर सामाजिक सुधार और आंबेडकरवादी धाराएं इसके उन प्रावधानों की आलोचना करती हैं जिन्हें वे जातिगत और लैंगिक असमानता से जोड़ती हैं।

यही वैचारिक अंतर आज की राजनीति में भी दिखाई देता है। कांग्रेस राहुल गांधी के बयान को सामाजिक समानता और महिला अधिकारों के सवाल से जोड़ रही है, जबकि भाजपा की ओर से इसे भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में चुनौती दी जा रही है।

बहस का केंद्र महिलाओं की बराबरी क्यों नहीं?

राजनीतिक बयानबाजी से अलग देखें तो मूल प्रश्न बेहद सीधा है—क्या महिलाओं को अपनी पहचान और अपने जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार होना चाहिए?

शिक्षा, रोजगार, संपत्ति, विवाह, करियर और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बराबर भागीदारी किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। यह संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।

इसलिए मनुस्मृति पर बहस चाहे जिस दिशा में जाए, महिलाओं की समानता का सवाल उससे अलग नहीं किया जा सकता। यदि किसी सामाजिक सोच के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और अधिकार सीमित किए जाते हैं, तो उस सोच पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक समाज का स्वाभाविक हिस्सा है।

सवाल परंपरा का नहीं, बराबरी का भी है

भारत की परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत व्यापक और विविध रही हैं। किसी भी परंपरा का सम्मान करते हुए उसके भीतर मौजूद असमानताओं पर सवाल उठाना अपने आप में देश या संस्कृति का अपमान नहीं माना जा सकता। समाज समय के साथ बदलता है और संविधान इसी बदलाव को समानता और गरिमा के सिद्धांतों के साथ दिशा देता है।

राहुल गांधी के बयान और योगी आदित्यनाथ के पलटवार ने एक पुरानी बहस को नए राजनीतिक संदर्भ में सामने ला दिया है। अब यह विवाद केवल मनुस्मृति की व्याख्या तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में महिला समानता, सामाजिक न्याय, परंपरा और संवैधानिक अधिकार जैसे बड़े सवाल हैं।

और अंततः सवाल यही है—क्या महिलाओं को बराबरी, स्वतंत्र पहचान और अपने अधिकारों की बात करने के लिए भी किसी परंपरा की अनुमति चाहिए?

संविधान का मूल सिद्धांत इस सवाल का जवाब स्पष्ट रूप से देता है—समानता किसी की कृपा नहीं, नागरिक अधिकार है।

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