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54 हजार करोड़ का हिसाब कहां है? CAG ने खोली सरकारी खातों की पोल

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अगस्त 2026

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट ने केंद्र सरकार के वित्तीय प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 31 मार्च 2025 तक 15 मंत्रालयों और विभागों में 33,973 उपयोगिता प्रमाण पत्र (Utilisation Certificates) लंबित थे, जिनमें करीब ₹54,282 करोड़ की रकम शामिल है। सवाल सीधा है—जब सरकार ने पैसा जारी किया तो उसका हिसाब देने वाला प्रमाण पत्र अब तक क्यों नहीं आया?

सरकार ने पैसा दिया, हिसाब अब तक अधूरा

उपयोगिता प्रमाण पत्र महज एक कागज नहीं होता। सरकारी भाषा में यह उस बात का प्रमाण है कि किसी योजना, संस्था या परियोजना के लिए जारी किया गया पैसा निर्धारित उद्देश्य पर खर्च किया गया। नियम के मुताबिक सामान्य तौर पर वित्त वर्ष खत्म होने के 12 महीने के भीतर इसका हिसाब उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन CAG की जांच में हजारों प्रमाण पत्र लंबे समय से लंबित मिले।

इनमें 13,926 उपयोगिता प्रमाण पत्र 2021-22 से 2023-24 के बीच के हैं और इनसे जुड़ी रकम करीब ₹38,287 करोड़ है। चिंता की बात यह भी है कि कुछ प्रमाण पत्र इतने पुराने हैं कि उनका संबंध 1985-86 तक से बताया गया है। यानी सरकारी पैसे के इस्तेमाल का हिसाब वर्षों तक लंबित रह सकता है।

सबसे बड़ा सवाल—₹54 हजार करोड़ की जवाबदेही कौन तय करेगा?

लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्र का यह मतलब नहीं है कि ₹54,282 करोड़ चोरी हो गए या पूरा पैसा गायब है। यह बात साफ समझना जरूरी है। लेकिन इतनी बड़ी रकम से जुड़े प्रमाण पत्र लंबित होना अपने आप में गंभीर वित्तीय निगरानी का सवाल है।

जब किसी खर्च का उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं मिलता, तो यह पता लगाने में मुश्किल होती है कि पैसा जिस काम के लिए दिया गया था, वास्तव में उसी काम पर खर्च हुआ या नहीं। यही वजह है कि CAG जैसी संवैधानिक संस्था ऐसी कमियों को गंभीरता से उठाती है।

आवास मंत्रालय सबसे ऊपर, उच्च शिक्षा विभाग भी सवालों में

CAG की रिपोर्ट में सबसे ज्यादा लंबित राशि आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से जुड़ी बताई गई है। यहां 1,992 उपयोगिता प्रमाण पत्रों से संबंधित करीब ₹18,272 करोड़ लंबित हैं।

इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग का नंबर आता है, जहां 3,530 प्रमाण पत्रों से जुड़ी करीब ₹14,359 करोड़ की राशि लंबित बताई गई है।

यानी केवल इन दो विभागों से जुड़ी लंबित रकम ही करीब ₹32,631 करोड़ बैठती है। यह कुल लंबित राशि का बड़ा हिस्सा है और इसलिए इन विभागों में वित्तीय निगरानी और जवाबदेही पर विशेष सवाल उठना स्वाभाविक है।

सिर्फ प्रमाण पत्र ही नहीं, ₹12,754 करोड़ का गलत वर्गीकरण भी

CAG की रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब ₹12,754 करोड़ के खर्च का गलत वर्गीकरण पाया गया।

सरल भाषा में समझें तो सरकार के खातों में कुछ खर्चों को सही श्रेणी में दर्ज नहीं किया गया। कहीं राजस्व खर्च और पूंजीगत खर्च के वर्गीकरण में समस्या मिली तो कहीं दूसरी तरह की लेखा संबंधी गलतियां सामने आईं।

सरकारी खातों में इस तरह की गलती छोटी बात नहीं है। बजट और खर्च का सही वर्गीकरण इसलिए जरूरी है ताकि संसद, सरकार और जनता को साफ पता चल सके कि पैसा किस मद में और किस उद्देश्य से खर्च हुआ।

सवाल विपक्ष का नहीं, जनता के पैसे का है

सरकारी खजाने में आने वाला पैसा आखिरकार जनता से ही आता है। कोई टैक्स देता है, कोई GST देता है, कोई पेट्रोल-डीजल पर टैक्स देता है और कोई दूसरे शुल्कों के जरिए सरकार के राजस्व में योगदान करता है।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा खर्च हुआ या नहीं। सवाल यह भी है कि पैसा कहां खर्च हुआ, किसने खर्च किया, किस उद्देश्य से खर्च हुआ और उसका प्रमाण कहां है?

सरकार की किसी योजना के लिए पैसा जारी होने के बाद वर्षों तक उपयोगिता प्रमाण पत्र लंबित रहना वित्तीय अनुशासन पर सवाल जरूर खड़ा करता है।

‘पैसा गायब’ कहना भी गलत, लेकिन ‘सब ठीक’ कहना भी मुश्किल

इस पूरे मामले में दो अतियों से बचना जरूरी है। केवल लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों के आधार पर यह कहना कि ₹54 हजार करोड़ गायब हो गए, तथ्यों से आगे बढ़ जाना होगा।

लेकिन दूसरी तरफ यह कहना भी मुश्किल है कि इतने बड़े पैमाने पर लंबित प्रमाण पत्र कोई गंभीर समस्या नहीं हैं।

सही सवाल यही है—आखिर जिन संस्थाओं और एजेंसियों को पैसा दिया गया, उन्होंने समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र क्यों नहीं दिया? और संबंधित मंत्रालयों ने समय पर इसकी वसूली या जांच क्यों नहीं की?

CAG की रिपोर्ट के बाद जवाबदेही तय होनी चाहिए

CAG की रिपोर्ट का मकसद केवल सरकार पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सरकारी वित्तीय व्यवस्था में कमियों को सामने लाना है। अब जरूरत है कि संबंधित मंत्रालय और विभाग लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों को जल्द से जल्द निपटाएं और यह स्पष्ट करें कि पैसा किस उद्देश्य पर खर्च हुआ।

जहां दस्तावेज नहीं मिल रहे हैं, वहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। जहां गलत लेखांकन हुआ है, वहां उसे सुधारा जाना चाहिए। और जहां खर्च में अनियमितता मिली है, वहां आवश्यक कार्रवाई होनी चाहिए।

आखिर जनता पूछेगी—हिसाब कब मिलेगा?

₹54,282 करोड़ कोई छोटी रकम नहीं है। 33,973 उपयोगिता प्रमाण पत्र सिर्फ आंकड़े नहीं हैं—ये सरकारी खर्च की जवाबदेही से जुड़े दस्तावेज हैं।

CAG की रिपोर्ट ने एक बेहद सीधा सवाल सामने रखा है—सरकारी खजाने से पैसा निकल गया, लेकिन उसका पूरा हिसाब कागज पर कब आएगा?

लोकतंत्र में सरकार को सिर्फ पैसा खर्च करने का अधिकार नहीं मिलता, बल्कि जनता के पैसे का पूरा और समय पर हिसाब देने की जिम्मेदारी भी मिलती है। और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है—पैसा किसने लिया, कहां खर्च हुआ और हिसाब देने में इतनी देर क्यों हुई?

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