साइंस एंड टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | बीजिंग | 22 अगस्त 2026
चीन अब चंद्रमा पर सिर्फ पहुंचने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि वहां भविष्य में इंसानों के लिए ठिकाना बनाने की तैयारी कर रहा है। इसी बड़ी योजना के तहत चीन अपना बेहद महत्वपूर्ण चांग’ई-7 चंद्र मिशन लॉन्च करने जा रहा है। इस मिशन का सबसे बड़ा लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के उन हिस्सों में पानी की बर्फ तलाशना है, जहां अरबों वर्षों से सूर्य की रोशनी नहीं पहुंची है।
अगर इन इलाकों में पर्याप्त मात्रा में पानी मिलता है तो यह भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बड़ी खोज होगी। पानी का इस्तेमाल सिर्फ पीने के लिए नहीं, बल्कि उससे ऑक्सीजन बनाने और भविष्य में रॉकेट के लिए हाइड्रोजन-ऑक्सीजन ईंधन तैयार करने में भी किया जा सकता है। यानी चंद्रमा पर मौजूद पानी भविष्य में वहां इंसानों के लंबे समय तक रहने की संभावना को मजबूत कर सकता है।
चांग’ई-7 क्यों है खास?
चीन का चांग’ई-7 मिशन उसके सबसे जटिल रोबोटिक चंद्र अभियानों में से एक है। मिशन का नाम चीन की पौराणिक चंद्र देवी चांग’ई के नाम पर रखा गया है। इसका मुख्य उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव को करीब से समझना और वहां मौजूद पानी तथा दूसरे महत्वपूर्ण पदार्थों की तलाश करना है।
मिशन में एक ऑर्बिटर, लैंडर, रोवर और एक विशेष हॉपिंग प्रोब शामिल होगा। ये सभी अलग-अलग काम करेंगे। ऑर्बिटर ऊपर से चंद्रमा की सतह और संभावित लैंडिंग साइट का अध्ययन करेगा। लैंडर चंद्रमा की सतह पर उतरकर वहां के वातावरण और जमीन की जांच करेगा। रोवर आसपास के इलाके में घूमकर वैज्ञानिक जानकारी जुटाएगा।
सबसे खास भूमिका हॉपिंग प्रोब की होगी। यह छोटे थ्रस्टर्स की मदद से एक जगह से दूसरी जगह छलांग लगा सकेगा और उन गहरे तथा अंधेरे इलाकों तक पहुंचने की कोशिश करेगा जहां सामान्य रोवर के लिए पहुंचना बेहद मुश्किल है।
चांद के दक्षिणी ध्रुव में ही पानी की तलाश क्यों?
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कुछ ऐसे क्रेटर हैं, जहां सूर्य की रोशनी लगभग कभी नहीं पहुंचती। इन्हें Permanently Shadowed Regions यानी स्थायी रूप से छायादार क्षेत्र कहा जाता है।
इन जगहों का तापमान बेहद कम हो सकता है और कुछ क्षेत्रों में यह करीब -203 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में पानी की बर्फ और दूसरे वाष्पशील पदार्थ लंबे समय तक सुरक्षित रह सकते हैं।
यही कारण है कि चीन के साथ-साथ दुनिया की दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों की नजर भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर है।
पानी मिला तो बदल जाएगी चंद्रमा की तस्वीर
चंद्रमा पर पानी मिलना अंतरिक्ष विज्ञान के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि उस पानी का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।
अगर वहां मौजूद बर्फ को निकालकर पानी में बदला जा सके तो भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से बड़ी मात्रा में पानी ले जाने की जरूरत कम हो सकती है। पानी से ऑक्सीजन भी बनाई जा सकती है। इसके अलावा पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करके रॉकेट ईंधन तैयार किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया को In-Situ Resource Utilization यानी ISRU कहा जाता है। आसान शब्दों में इसका मतलब है—जहां इंसान पहुंचे, वहां उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल वहीं किया जाए।
हॉपिंग प्रोब करेगा सीधी जांच
चांग’ई-7 का हॉपिंग प्रोब इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इसका काम उन जगहों तक पहुंचना है जहां सामान्य पहिए वाला रोवर आसानी से नहीं पहुंच सकता।
प्रोब चंद्र मिट्टी का नमूना लेकर उसकी जांच करेगा। इसके वैज्ञानिक उपकरण मिट्टी में मौजूद पानी और दूसरे पदार्थों का पता लगाने की कोशिश करेंगे। यह करीब एक मीटर तक गहराई में जाकर नमूना लेने में सक्षम होगा।
वैज्ञानिक पानी में मौजूद हाइड्रोजन के अलग-अलग रूपों का भी अध्ययन करेंगे। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि चंद्रमा पर पानी आया कहां से—धूमकेतुओं से, क्षुद्रग्रहों से या सौर हवा से।
मिशन में कई देशों की भागीदारी
चांग’ई-7 सिर्फ चीन का वैज्ञानिक मिशन नहीं है। इसमें कई देशों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े वैज्ञानिक उपकरण भी शामिल हैं। मिशन में करीब 18 वैज्ञानिक पेलोड रखे जाने की योजना है।
मिशन को चीन के पहले से मौजूद क्यूकियाओ-2 संचार उपग्रह का भी समर्थन मिलेगा। यह चंद्रमा के दूरस्थ हिस्सों में मिशन के साथ संचार बनाए रखने में मदद करेगा।
चीन की नजर चंद्रमा पर स्थायी ठिकाने पर
चांग’ई-7 को चीन की एक लंबी योजना के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। इसके बाद चांग’ई-8 मिशन की भी योजना है। इन मिशनों से हासिल जानकारी का इस्तेमाल भविष्य में चंद्रमा पर वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र बनाने की दिशा में किया जा सकता है।
चीन 2030 से पहले इंसानों को चंद्रमा पर भेजने और रूस के साथ मिलकर International Lunar Research Station (ILRS) विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है।
इसका मतलब साफ है—चीन की नजर सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचने पर नहीं है। वह वहां लंबे समय तक वैज्ञानिक गतिविधियां चलाने की क्षमता विकसित करना चाहता है।
अमेरिका से बढ़ती अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा
चीन का यह मिशन ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका भी अपने Artemis कार्यक्रम के जरिए चंद्रमा पर दोबारा इंसानों को भेजने और भविष्य में वहां स्थायी गतिविधियां बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव में पानी की मौजूदगी ने इस क्षेत्र को और महत्वपूर्ण बना दिया है। आने वाले वर्षों में चंद्रमा पर पानी, ऊर्जा और दूसरे संसाधनों की खोज अंतरिक्ष विज्ञान के साथ-साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी हिस्सा बन सकती है।
चांद पर भविष्य की बुनियाद
चांग’ई-7 की असली अहमियत सिर्फ इस बात में नहीं है कि चीन को चंद्रमा पर पानी मिलता है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या यह मिशन भविष्य में चंद्रमा पर इंसानों के लिए स्थायी आधार बनाने की राह आसान करेगा।
अगर दक्षिणी ध्रुव पर पानी की बर्फ की पर्याप्त मात्रा और उसका सही स्थान पता चल जाता है, तो भविष्य के मानव मिशनों की योजना काफी बदल सकती है। पृथ्वी से पानी, ऑक्सीजन और ईंधन ले जाने की जरूरत कम हो सकती है और चंद्रमा खुद भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक स्टॉपिंग पॉइंट बन सकता है।
चांग’ई-7 इसलिए सिर्फ चंद्रमा की मिट्टी और पानी की तलाश नहीं है। यह उस भविष्य की तलाश है, जिसमें चंद्रमा इंसानों के लिए सिर्फ देखने और पहुंचने की जगह नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में आगे बढ़ने का एक स्थायी पड़ाव बन सकता है।




