राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 अगस्त 2026
सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी ने ग्रामीण रोजगार की उस नीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा कवच बनाया था। अदालत ने खत्म किए जा चुके महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा को “सलाहनीय योजना” बताते हुए कहा कि यह न तो मुफ्तखोरी थी और न ही ग्रामीण मजदूरों का शोषण।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनरेगा को लंबे समय से राजनीतिक बहस में कभी ‘गरीबों का अधिकार’ तो कभी ‘मुफ्त की योजना’ बताकर कठघरे में खड़ा किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने कम-से-कम इस सवाल पर एक गंभीर संवैधानिक और सामाजिक दृष्टिकोण सामने रखा है कि गरीब को काम की कानूनी गारंटी देना मुफ्तखोरी कैसे हो सकती है?
मनमोहन सरकार का बड़ा फैसला
मनरेगा की जड़ें 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार के उस ऐतिहासिक फैसले में हैं, जब ग्रामीण परिवारों को रोजगार की कानूनी गारंटी देने वाला कानून बनाया गया। इसे 2 फरवरी 2006 से देश के 200 जिलों में लागू किया गया और बाद में पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों तक विस्तार दिया गया।
इस कानून की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि सरकार केवल रोजगार देने का वादा नहीं कर रही थी, बल्कि काम मांगने वाले ग्रामीण परिवार को साल में कम-से-कम 100 दिनों के मजदूरी वाले रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई थी।
यानी यह किसी व्यक्ति को बिना काम पैसा देने की योजना नहीं थी। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को सार्वजनिक कार्यों में रोजगार दिया जाता था और उसके बदले मजदूरी मिलती थी।
‘मुफ्तखोरी’ नहीं, काम का अधिकार
मनरेगा की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि इसने ग्रामीण गरीब को केवल सरकारी सहायता का लाभार्थी नहीं माना, बल्कि काम मांगने और मजदूरी पाने का अधिकार रखने वाला नागरिक बनाया।
अगर निर्धारित समय में रोजगार नहीं मिलता था तो बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान भी था। भुगतान में देरी होने पर मुआवजे की व्यवस्था की गई। ग्राम पंचायतों की भूमिका तय की गई और सामाजिक ऑडिट जैसे प्रावधानों के जरिए स्थानीय स्तर पर निगरानी का रास्ता बनाया गया।
यही कारण है कि मनरेगा को महज कल्याणकारी योजना के बजाय अधिकार-आधारित कानून के रूप में देखा गया।
गांव की अर्थव्यवस्था को मिला सहारा
मनरेगा का असर केवल मजदूर की जेब तक सीमित नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब, जल संरक्षण, नहर, सड़क, भूमि विकास और अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियों से जुड़े काम कराए गए।
जब ग्रामीण परिवार को गांव में ही रोजगार मिलता है तो मजबूरी में शहरों की ओर पलायन का दबाव भी कम हो सकता है। मजदूर की आय बढ़ती है तो उसका असर स्थानीय बाजार पर पड़ता है। इस तरह मनरेगा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में न्यूनतम आय और मांग बनाए रखने वाले सुरक्षा कवच के रूप में भी देखा गया।
2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान भी मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों की क्रय शक्ति को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्थिक विशेषज्ञों ने कई मौकों पर इसे ग्रामीण मांग को बनाए रखने वाले महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रमों में गिना।
संकट के समय मनरेगा का महत्व
कोविड-19 महामारी के दौरान जब करोड़ों लोगों की आजीविका प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर गांव लौटे, तब मनरेगा की उपयोगिता एक बार फिर सामने आई।
वित्त वर्ष 2020-21 में मनरेगा पर रिकॉर्ड स्तर का खर्च हुआ और करोड़ों परिवारों को रोजगार मिला। यह उस समय ग्रामीण भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा तंत्र साबित हुआ, जब निजी रोजगार और शहरी अर्थव्यवस्था दोनों भारी दबाव में थे।
अब नई व्यवस्था पर सवाल
अब मनरेगा की जगह विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी VB-G RAM G Act लागू किया गया है। नई व्यवस्था में गारंटीकृत रोजगार की सीमा 100 से बढ़ाकर 125 दिन किए जाने की बात है।
लेकिन यहीं एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। सामाजिक संगठनों का दावा है कि रोजगार के गारंटीकृत दिनों में वृद्धि के बावजूद वास्तविक रोजगार सृजन में लगभग 50 फीसदी की गिरावट आई है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कानून में कितने दिन रोजगार की गारंटी लिखी गई है। असली सवाल यह है कि जमीनी स्तर पर कितने परिवारों को वास्तव में कितने दिन काम मिला।
अरुणा रॉय की याचिका और मजदूरी का सवाल
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय की याचिका पर सामने आया। याचिका में मनरेगा के तहत मजदूरी भुगतान में देरी और उसके लिए मुआवजे की मांग की गई है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, चेरिल डी’सूजा और नेहा राठी ने अदालत के सामने यह सवाल भी उठाया कि क्या कानून राज्य द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी तय कर सकता है।
यही सवाल मनरेगा की मूल भावना से जुड़ा है—गरीब को सिर्फ काम नहीं, सम्मानजनक मजदूरी और समय पर भुगतान भी मिलना चाहिए।
मनमोहन सिंह की विरासत पर फिर बहस
मनरेगा को लेकर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इसकी बुनियादी सोच को नजरअंदाज करना मुश्किल है। मनमोहन सिंह सरकार ने ग्रामीण गरीब को सरकारी खैरात का पात्र बनाने के बजाय काम मांगने का कानूनी अधिकार देने का रास्ता चुना।
आज जब सुप्रीम कोर्ट स्वयं इसे “सलाहनीय योजना” और न मुफ्तखोरी, न शोषण वाली व्यवस्था के रूप में देखता है, तो मनरेगा पर पुराने राजनीतिक आरोपों की समीक्षा की जरूरत महसूस होती है।
125 दिन की गारंटी कागज पर बड़ी दिखाई दे सकती है, लेकिन असली कसौटी रोजगार की उपलब्धता, मजदूरी की दर और समय पर भुगतान है। आखिर ग्रामीण गरीब को कितने दिन का अधिकार मिला—यह कानून की किताब नहीं, जमीन पर मिलने वाला काम तय करता है।




