राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 20 अगस्त 2026
कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार का 20 अगस्त 2026 को निधन हो गया। वह 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में लंबे समय तक कानूनी विवाद के केंद्र में रहे। उनके निधन की खबर ऐसे समय आई है जब संबंधित मामले में उन्हें बरी किए जाने के कुछ ही महीने बीते थे।
सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में रहे और लंबे समय तक पार्टी से जुड़े रहे। 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़की थी। इन घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और हजारों परिवार प्रभावित हुए। दिल्ली में हुई हिंसा के मामलों में राजनीतिक नेताओं और अन्य लोगों की कथित भूमिका को लेकर दशकों तक कानूनी और राजनीतिक विवाद चलता रहा।
सज्जन कुमार का नाम भी 1984 के दंगा मामलों में प्रमुखता से सामने आया। उनके खिलाफ अलग-अलग मामलों में जांच और मुकदमे चले। कुछ मामलों में अदालतों के फैसले उनके पक्ष में रहे, जबकि एक प्रमुख मामले में उन्हें दोषी ठहराकर सजा भी सुनाई गई थी। बाद में कानूनी प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों में इन फैसलों को चुनौती दी गई। उनके मामले ने 1984 की हिंसा में न्याय मिलने में हुई लंबी देरी और पीड़ित परिवारों के संघर्ष को लेकर भी लगातार सवाल खड़े किए।
हाल के महीनों में उन्हें एक मामले में बरी किए जाने की खबर सामने आई थी। हालांकि, 1984 की हिंसा से जुड़े मामलों का व्यापक राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ इससे कहीं बड़ा है। तीन दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पीड़ित परिवारों के लिए न्याय, जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण जैसे सवाल पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
सज्जन कुमार का निधन 1984 की उस त्रासदी की याद को एक बार फिर सामने ले आया है, जिसने दिल्ली और देश के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा असर डाला था। यह घटना सिर्फ एक पूर्व सांसद की मृत्यु की खबर नहीं है, बल्कि उन हजारों परिवारों की पीड़ा और उस लंबे न्यायिक संघर्ष की भी याद दिलाती है, जो 1984 के बाद शुरू हुआ और वर्षों तक चलता रहा।
1984 के सिख विरोधी दंगे भारतीय लोकतंत्र के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिने जाते हैं। इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों की जवाबदेही और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग समय-समय पर राजनीतिक विमर्श में लौटती रही है। सज्जन कुमार की मृत्यु के साथ उनके खिलाफ चल रहे कानूनी विवादों का एक अध्याय भले समाप्त हो गया हो, लेकिन 1984 की हिंसा से जुड़े न्याय और जवाबदेही के बड़े सवाल आज भी भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद हैं।




