राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 अगस्त 2026
दान घटा, लेकिन PM CARES का खजाना बढ़ता गया
PM CARES Fund को लेकर जारी ताजा ऑडिटेड वित्तीय आंकड़ों ने फंड के संचालन और राशि के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो वित्तीय वर्षों की ऑडिटेड रिपोर्ट एक साथ जारी होने के बाद सामने आया है कि 2022-23 से 2024-25 के बीच PM CARES का corpus करीब 25.8 फीसदी बढ़कर ₹6,722 करोड़ से ₹8,453 करोड़ हो गया। खास बात यह है कि यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई जब फंड में आने वाले दान में गिरावट दर्ज हुई। यानी दान कम हुआ, लेकिन ब्याज और अन्य वित्तीय आय के चलते फंड का कुल आकार लगातार बढ़ता रहा। सवाल अब यह है कि जब आपात स्थितियों से निपटने के लिए बनाया गया फंड हजारों करोड़ रुपये की राशि संभाल रहा था, तब उसके इस्तेमाल की रफ्तार इतनी धीमी क्यों रही?
₹8,453 करोड़ का corpus, लेकिन खर्च सिर्फ ₹87.5 लाख
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा फंड के utilisation का है। उपलब्ध विवरणों के मुताबिक 2022-23 में करीब ₹437.9 करोड़ का उपयोग हुआ था, लेकिन 2024-25 में यह घटकर सिर्फ ₹87.5 लाख रह गया। यानी जिस फंड का corpus हजारों करोड़ रुपये में है, उसका इस्तेमाल 2024-25 में उपलब्ध राशि की तुलना में बेहद मामूली रहा। रिपोर्ट में इसे उपलब्ध corpus का लगभग 0.01 फीसदी बताया गया है। यही आंकड़ा PM CARES के मकसद और उसके वास्तविक इस्तेमाल के बीच अंतर को लेकर बहस को तेज कर सकता है।
फंड बनाया आपदा के लिए था, फिर पैसा पड़ा क्यों रहा?
PM CARES Fund की स्थापना आपात परिस्थितियों में राहत और सहायता के लिए की गई थी। कोरोना महामारी के दौरान इस फंड का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में आया था और ऑक्सीजन प्लांट सहित कई स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए इसके इस्तेमाल की जानकारी सामने आई थी। लेकिन अब जब महामारी का तत्काल संकट पीछे छूट चुका है और फंड का corpus लगातार बढ़ रहा है, तब यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस बड़ी राशि की उपयोगिता किस तरह तय की जा रही है। अगर राशि वास्तव में जरूरतमंदों और आपात स्थितियों के लिए उपलब्ध है, तो उसका उपयोग किन परिस्थितियों में किया जाएगा और किस स्तर की जरूरत को आपात माना जाएगा—इस पर अधिक स्पष्टता की जरूरत दिखाई देती है।
दान कम हुआ तो ब्याज ने संभाल लिया खजाना
PM CARES के आंकड़ों में एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। एक तरफ लोगों और संस्थानों से मिलने वाले दान में कमी आई, दूसरी तरफ corpus में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई। इसका बड़ा कारण फंड पर मिलने वाला ब्याज और उससे होने वाली आय है। यानी नई रकम के रूप में योगदान कम होने के बावजूद पहले से जमा बड़ी राशि वित्तीय रिटर्न के जरिए बढ़ती रही। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है—जब फंड के पास लगातार बढ़ती आर्थिक क्षमता है, तो क्या इसके इस्तेमाल के लिए स्पष्ट प्राथमिकताएं और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए?
दो साल की देरी से जारी हुए वित्तीय आंकड़े
इस पूरे मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—ऑडिटेड वित्तीय विवरणों का एक साथ जारी होना। वित्तीय वर्ष 2023-24 और 2024-25 के विवरण मंगलवार को जारी किए गए, यानी दो साल की देरी के बाद दोनों वर्षों के आंकड़े सार्वजनिक हुए। सार्वजनिक धन से जुड़े किसी बड़े फंड के मामले में वित्तीय जानकारी समय पर सामने आना पारदर्शिता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। देरी से आंकड़े सामने आने के कारण भी यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनता को फंड की आय, corpus और खर्च की स्थिति की जानकारी नियमित और समय पर क्यों नहीं मिली।
खर्च घटकर लाखों में क्यों पहुंच गया?
यहां सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि PM CARES के पास कितने पैसे हैं। असली सवाल यह है कि खर्च की राशि इतनी तेजी से क्यों घटी? 2022-23 में जहां ₹437.9 करोड़ के आसपास उपयोग दर्ज हुआ, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा सिर्फ ₹87.5 लाख रह गया। यानी utilisation में भारी गिरावट आई। यदि उस अवधि में बड़ी आपात जरूरत नहीं थी, तो कम खर्च को स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन तब भी फंड के पास मौजूद हजारों करोड़ रुपये और उसके उपयोग की नीति को लेकर स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सवाल सिर्फ रकम का नहीं, जवाबदेही का है
PM CARES को लेकर बहस को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि पैसा खर्च हुआ या नहीं। असली सवाल पारदर्शिता, प्राथमिकता और जवाबदेही का है। जनता और दानदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि फंड में कितनी राशि आई, कितनी राशि निवेश या जमा रही, उससे कितना ब्याज मिला, किस मद में कितना खर्च हुआ और भविष्य की आपात स्थितियों के लिए कितनी राशि सुरक्षित रखी गई। अगर फंड का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बिना इस्तेमाल के बढ़ता रहता है, तो उसके संचालन की नीति और खर्च के मानदंडों पर सार्वजनिक स्पष्टीकरण और भी जरूरी हो जाता है।
₹8,453 करोड़ का सवाल—पैसा सुरक्षित है या निष्क्रिय?
आज PM CARES के सामने सबसे बड़ा प्रश्न शायद यही है कि हजारों करोड़ रुपये का यह corpus किस रणनीति के तहत रखा गया है। एक दृष्टिकोण यह हो सकता है कि आपातकालीन फंड में बड़ी राशि हमेशा उपलब्ध रहनी चाहिए, ताकि महामारी, प्राकृतिक आपदा या किसी अन्य बड़े संकट में तत्काल पैसा लगाया जा सके। लेकिन दूसरा सवाल यह है कि अगर वर्षों तक राशि का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल नहीं होता, तो क्या इसकी प्राथमिकताओं और उपयोग के मानदंडों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए? यही वह बिंदु है जहां वित्तीय प्रबंधन और सार्वजनिक जवाबदेही एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
अब सरकार से सीधे सवाल जरूरी हैं
ताजा आंकड़े सामने आने के बाद सरकार और PM CARES Fund से जुड़े प्रबंधन के सामने कुछ सीधे सवाल खड़े होते हैं—दान में गिरावट के बावजूद corpus कितना और क्यों बढ़ा? ब्याज से कितनी आय हुई? 2024-25 में utilisation केवल ₹87.5 लाख तक क्यों सीमित रहा? उपलब्ध ₹8,453 करोड़ के corpus में से कितनी राशि तत्काल आपात स्थिति के लिए earmark है? और दो वित्तीय वर्षों के ऑडिटेड विवरण एक साथ जारी करने में इतनी देरी क्यों हुई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब ही इस बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर वित्तीय पारदर्शिता के वास्तविक मुद्दे तक ले जा सकता है।
PM CARES का असली इम्तिहान अब पारदर्शिता है
PM CARES का corpus बढ़ना अपने आप में कोई समस्या नहीं है। आपातकालीन फंड का मजबूत रहना एक सकारात्मक बात भी हो सकती है। लेकिन ₹8,453 करोड़ का बड़ा corpus और उसके मुकाबले बेहद कम utilisation निश्चित तौर पर सार्वजनिक चर्चा और जांच का विषय है। सवाल यह नहीं कि पैसा बचा क्यों है; सवाल यह है कि पैसा किस उद्देश्य से रखा गया है, उसके इस्तेमाल के नियम क्या हैं और जनता को उसकी पूरी जानकारी कितनी नियमितता और पारदर्शिता से दी जाती है। जब फंड का नाम ही नागरिकों की सहायता और आपात स्थितियों से जुड़ा है, तो उसकी सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उसका बड़ा खजाना नहीं, बल्कि उस खजाने पर जनता का भरोसा होना चाहिए।




