राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला पूर्वोत्तर के अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले से जुड़ा है, जहां चीन की ओर से कथित अतिक्रमण और भारतीय सेना की कुछ इलाकों में गश्त को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। खास बात यह है कि ये आरोप किसी बाहरी संगठन की ओर से नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले NDA से जुड़े क्षेत्रीय राजनीतिक दल पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश यानी PPA की एक फैक्ट-फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट के बाद सामने आए हैं। रिपोर्ट ने दिल्ली से लेकर अरुणाचल तक राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है।
मामला ताकसिंग क्षेत्र का है, जो बेहद दुर्गम और पहाड़ी इलाका है। PPA की चार सदस्यीय टीम ने वहां जाकर हालात का जायजा लिया। टीम का दावा है कि खराब मौसम, भारी बारिश, अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के कारण भारतीय सुरक्षाबल अप्रैल से अक्टूबर के बीच इस इलाके में नियमित गश्त नहीं कर पाते। दूसरी ओर, रिपोर्ट के मुताबिक चीनी सैनिक इस दौरान भी सीमा क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं। यानी सवाल सिर्फ कथित अतिक्रमण का नहीं, बल्कि सीमा तक पहुंचने वाली भारतीय बुनियादी सुविधाओं और पूरे साल प्रभावी निगरानी की क्षमता का भी है।
रिपोर्ट में शेरा-5 नामक एक बॉर्डर पेट्रोलिंग प्वाइंट का भी जिक्र है। स्थानीय लोगों के हवाले से दावा किया गया है कि 2023 में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA के साथ टकराव के बाद भारतीय सैनिकों ने इस इलाके में गश्त बंद कर दी। स्थानीय लोगों ने फैक्ट-फाइंडिंग टीम के सामने अपने पारंपरिक शिकार क्षेत्रों तक पहुंच प्रभावित होने की शिकायत भी की। PPA के उपाध्यक्ष कलिंग जेरंग ने आरोप लगाया कि ये कथित घुसपैठ अचानक नहीं हुई, बल्कि वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ी है। हालांकि, ये आरोप स्थानीय रिपोर्ट और राजनीतिक प्रतिनिधियों के दावों पर आधारित हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए जाने की जरूरत है।
इसी बीच पिछले महीने Nah Welfare Society, जो स्थानीय जनजातीय संगठन है, ने भी सरकारी अधिकारियों को पत्र लिखकर दावा किया था कि इलाके में चीनी अतिक्रमण बढ़ा है और चीन अधिक से अधिक जमीन पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है। इन दावों ने इसलिए भी चिंता बढ़ाई है क्योंकि सीमा पर रहने वाले स्थानीय समुदाय अक्सर सबसे पहले जमीन पर होने वाले बदलावों को महसूस करते हैं। लेकिन इन आरोपों और जमीनी दावों के बीच वास्तविक स्थिति क्या है, इसे लेकर अब केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की विस्तृत स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत सरकार और सेना का रुख हालांकि इन दावों से अलग है। भारतीय सेना ने मीडिया में सामने आई कथित चीनी घुसपैठ की खबरों को गलत और आधारहीन बताया है। विदेश मंत्रालय का जवाब भी सावधानी भरा रहा। मंत्रालय ने कहा कि भारत चीन के साथ सीमा के मुद्दे को बेहद गंभीर मानता है और सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। यानी सरकार ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन साथ ही सीमा की संवेदनशीलता को लेकर अपनी चिंता भी दोहराई है।
उधर चीन ने भी किसी नए अतिक्रमण की पुष्टि नहीं की। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि फिलहाल भारत-चीन सीमा की स्थिति सामान्य रूप से स्थिर है। चीन के मुताबिक दोनों देशों के बीच पिछले सप्ताह सीमा मामलों पर 36वीं बैठक हुई और दोनों पक्षों ने राजनयिक तथा सैन्य माध्यमों से संवाद जारी रखने और सीमा पर शांति बनाए रखने पर सहमति जताई है। ऐसे में फिलहाल तस्वीर दो दावों के बीच खड़ी है—एक तरफ स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की कथित जमीनी रिपोर्ट, दूसरी तरफ भारतीय सेना का इसे आधारहीन बताना और चीन का सीमा स्थिति को स्थिर बताना।
लेकिन इस विवाद को समझने के लिए भारत-चीन सीमा का इतिहास जानना जरूरी है। भारत और चीन के बीच करीब 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा है, लेकिन दोनों देश आज तक पूरी सीमा पर एक समान वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर सहमत नहीं हो सके हैं। अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद की जड़ 1914 के शिमला समझौते और मैकमोहन लाइन तक जाती है। भारत मैकमोहन लाइन को अपनी सीमा मानता है, जबकि चीन इसे स्वीकार नहीं करता और पूरे अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता है। चीन अरुणाचल को अपने नक्शों में ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहता रहा है।
भारत-चीन सीमा विवाद ने 1962 में युद्ध का रूप भी लिया था। इसके बाद सीमा पर तनाव अलग-अलग दौर में बढ़ता रहा। डोकलाम में 2017 का 73 दिन लंबा गतिरोध और फिर गलवान में जून 2020 की हिंसक झड़प, जिसमें 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई, दोनों देशों के रिश्तों पर गहरा असर डाल चुके हैं। पूर्वी सेक्टर में सिक्किम के नाकू ला में भी 2020 और 2021 में टकराव की घटनाएं हुईं। यही वजह है कि अरुणाचल प्रदेश में सामने आया कोई भी नया सीमा विवाद सिर्फ स्थानीय मुद्दा नहीं माना जाता।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि सीमा पर छोटी-सी घटना भी बड़े तनाव में बदल सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारत और चीन के बीच LAC को लेकर अलग-अलग दावे होने के कारण दोनों देशों की गश्ती टीमें कई बार ऐसे क्षेत्रों तक पहुंच जाती हैं जिन्हें दूसरा पक्ष अपना इलाका मानता है। ऐसे में जमीन पर मौजूद सैनिकों के बीच स्थानीय स्तर का टकराव तेजी से राजनयिक और सैन्य तनाव में बदल सकता है।
यह पूरा मामला ऐसे समय सामने आया है जब भारत और चीन अपने रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश कर रहे हैं। खास तौर पर 2020 के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत का लंबा दौर चला है। वहीं, आने वाले दिनों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत आने की संभावनाओं और सितंबर में भारत में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन के संदर्भ में भी दोनों देशों के संबंध महत्वपूर्ण हैं। ऐसे समय में अरुणाचल से जुड़े ये आरोप नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक चुनौती पैदा कर सकते हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि सीमा पर तनाव के बावजूद भारत और चीन के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025-26 में दोनों देशों के बीच वस्तुओं का व्यापार करीब 151.1 अरब डॉलर रहा। लेकिन इसमें संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है। इसी अवधि में चीन से भारत का आयात करीब 131.63 अरब डॉलर, जबकि भारत का चीन को निर्यात लगभग 19.47 अरब डॉलर रहा। यानी राजनीतिक और सैन्य स्तर पर तनाव के बावजूद आर्थिक निर्भरता लगातार बनी हुई है।
यही भारत-चीन रिश्ते की सबसे बड़ी जटिलता है—सीमा पर अविश्वास, लेकिन कारोबार में बढ़ती निर्भरता। विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देश फिलहाल वास्तविक समाधान की बजाय ‘मैनेज्ड कॉम्पिटिशन’ यानी नियंत्रित प्रतिस्पर्धा के दौर में हैं। आर्थिक रिश्ते सुधर सकते हैं, बातचीत चल सकती है, लेकिन जब तक सीमा विवाद का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक तनाव का खतरा बना रहेगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अरुणाचल प्रदेश में कथित चीनी अतिक्रमण के ये दावे आखिर कितने सही हैं? भारतीय सेना इन्हें आधारहीन बता चुकी है, जबकि स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधि और जनजातीय संगठन जमीनी स्थिति को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। ऐसे में जरूरत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर पारदर्शी तथ्य सामने रखने की है। क्योंकि सीमा पर सिर्फ जमीन का सवाल नहीं होता—वहां रहने वाले लोगों का भरोसा, सैनिकों की सुरक्षा और देश की संप्रभुता तीनों जुड़े होते हैं।
और यही वजह है कि अरुणाचल से उठी यह कहानी सिर्फ एक सीमा विवाद नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों की अगली परीक्षा का संकेत भी हो सकती है।




