Home » Environment » पेड़ों की गिनती से नहीं बचेगा जंगल! CAG की रिपोर्ट ने Green India Mission की खोली पोल

पेड़ों की गिनती से नहीं बचेगा जंगल! CAG की रिपोर्ट ने Green India Mission की खोली पोल

ग्रीन इंडिया मिशन पर CAG ऑडिट में सवाल; जंगल बहाली की जगह पेड़ों की संख्या पर जोर देने की रणनीति पर चिंता, पर्यावरण संरक्षण के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बढ़ा अंतर

पर्यावरण | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 अगस्त 2026

भारत में पर्यावरण संरक्षण और जंगलों को बचाने के लिए चलाए जा रहे Green India Mission को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की ऑडिट रिपोर्ट ने एक अहम सवाल खड़ा किया है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि देश में कितने पेड़ लगाए गए या कितने पेड़ों की संख्या बढ़ी, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या देश के जंगल वास्तव में बहाल हो रहे हैं? CAG की ऑडिट पर आधारित आलोचना में इस बात पर जोर दिया गया है कि जंगल को केवल पेड़ों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। एक स्वस्थ जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होता, बल्कि उसमें जैव विविधता, मिट्टी, पानी, वन्यजीव, स्थानीय पारिस्थितिकी और प्राकृतिक वन तंत्र का संतुलन भी शामिल होता है। ऐसे में अगर जंगलों की बहाली के बजाय केवल पेड़ लगाने और उनकी संख्या गिनने पर जोर दिया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट सकता है।

Green India Mission का मूल उद्देश्य केवल पेड़ लगाना नहीं, बल्कि देश के खराब हो चुके वन क्षेत्रों और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना है। इसका मतलब ऐसे जंगल तैयार करना है जो लंबे समय तक कार्बन को अपने भीतर सुरक्षित रख सकें, मिट्टी और जल संसाधनों की रक्षा कर सकें, वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध करा सकें और स्थानीय समुदायों की जरूरतों को भी सहारा दे सकें। लेकिन जब किसी योजना की सफलता को मुख्य रूप से लगाए गए पेड़ों की संख्या या हरित क्षेत्र में दिखाई देने वाले बदलाव से मापा जाने लगे, तो यह खतरा पैदा होता है कि कागज पर उपलब्ध आंकड़े वास्तविक पर्यावरणीय सुधार की पूरी कहानी न बता पाएं। जंगल की गुणवत्ता, पेड़ों की प्रजातियां, उनकी प्राकृतिक वृद्धि और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

CAG की ऑडिट को लेकर सामने आए सवाल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि ‘जंगल’ और ‘पेड़’ को एक ही चीज मानना पर्यावरण संरक्षण की बड़ी भूल हो सकती है। एक क्षेत्र में बड़ी संख्या में पेड़ लगाए जाने के बावजूद वह प्राकृतिक जंगल का विकल्प नहीं बन सकता, खासकर तब जब वहां स्थानीय प्रजातियों की विविधता न हो या प्राकृतिक वन तंत्र विकसित न हुआ हो। जंगल अपने आप में एक जटिल पारिस्थितिक व्यवस्था है, जिसमें पेड़-पौधे, पक्षी, कीड़े-मकौड़े, वन्यजीव, जलस्रोत और मिट्टी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इसलिए वास्तविक वन बहाली का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि कितने पौधे लगाए गए।

इस पूरी बहस का संबंध सरकारी योजनाओं की निगरानी और उनके परिणामों को मापने के तरीके से भी है। अगर किसी मिशन में हजारों या लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन कुछ वर्षों बाद उनमें से कितने जीवित बचे, किस तरह के जंगल का निर्माण हुआ और स्थानीय पारिस्थितिकी पर क्या प्रभाव पड़ा—इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, तो केवल पौधारोपण के आंकड़े योजना की सफलता का पूरा प्रमाण नहीं हो सकते। पर्यावरणीय योजनाओं में शुरुआती लक्ष्य और वास्तविक परिणाम के बीच अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि जंगल तैयार होने में वर्षों, कई बार दशकों का समय लगता है।

यह सवाल भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश एक तरफ जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना कर रहा है और दूसरी तरफ तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं, खनन और औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे समय में वन संरक्षण की नीति केवल नए पौधे लगाने तक सीमित नहीं रह सकती। मौजूदा प्राकृतिक जंगलों को बचाना, क्षतिग्रस्त जंगलों को पुनर्जीवित करना और जैव विविधता वाले क्षेत्रों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। यदि प्राकृतिक जंगल लगातार कमजोर होते रहें और उनकी जगह केवल नए पौधारोपण के आंकड़े बढ़ते जाएं, तो हरित क्षेत्र के आंकड़े वास्तविक पर्यावरणीय स्थिति की पूरी तस्वीर नहीं दे पाएंगे।

Green India Mission के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण पहलू स्थानीय समुदायों की भूमिका है। जंगलों से सबसे गहरा रिश्ता उन लोगों का होता है जो पीढ़ियों से वन क्षेत्रों के आसपास रहते आए हैं। वन संरक्षण तभी स्थायी हो सकता है जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और उनकी आजीविका की जरूरतों को ध्यान में रखा जाए। केवल ऊपर से तय किए गए पौधारोपण के लक्ष्य पूरे करने से जंगलों की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती। स्थानीय स्तर पर यह देखना भी जरूरी है कि लगाए गए पौधे उस क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के अनुकूल हैं या नहीं और उनके संरक्षण की व्यवस्था कितनी मजबूत है।

CAG की ऑडिट से उठने वाली बहस का व्यापक संदेश यही है कि पर्यावरण संरक्षण में संख्या से ज्यादा गुणवत्ता मायने रखती है। कितने पौधे लगाए गए, कितने हेक्टेयर क्षेत्र को हरित बताया गया या कितने अभियान चलाए गए—ये आंकड़े महत्वपूर्ण जरूर हैं, लेकिन अंतिम सवाल यह होना चाहिए कि जमीन पर कितना स्वस्थ और टिकाऊ वन तैयार हुआ। क्या वन्यजीवों का आवास मजबूत हुआ? क्या स्थानीय जैव विविधता बची? क्या मिट्टी और पानी की स्थिति बेहतर हुई? क्या लगाए गए पेड़ वर्षों बाद भी मौजूद हैं? और क्या प्राकृतिक जंगलों पर दबाव कम हुआ? इन सवालों के जवाब ही किसी वन बहाली कार्यक्रम की वास्तविक सफलता तय कर सकते हैं।

अब जरूरत इस बात की है कि Green India Mission जैसी योजनाओं की सफलता को मापने के लिए अधिक व्यापक और वैज्ञानिक पैमाने अपनाए जाएं। केवल पौधों की संख्या गिनने के बजाय उनकी जीवित रहने की दर, स्थानीय प्रजातियों की मौजूदगी, जैव विविधता, जंगल की गुणवत्ता, जल संरक्षण और पारिस्थितिक सुधार जैसे मानकों को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। साथ ही, सरकारी आंकड़ों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर को कम करने के लिए नियमित स्वतंत्र निगरानी और पारदर्शी रिपोर्टिंग भी जरूरी है।

CAG की ऑडिट ने भारत की वन नीति के सामने एक बुनियादी सवाल रख दिया है—क्या हम जंगल बचा रहे हैं या सिर्फ पेड़ों की गिनती कर रहे हैं? अगर लक्ष्य वास्तव में जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना, जैव विविधता बचाना और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण सुनिश्चित करना है, तो नीति का केंद्र केवल पौधारोपण नहीं बल्कि प्राकृतिक जंगलों की बहाली और संरक्षण होना चाहिए। क्योंकि कागज पर बढ़ती पेड़ों की संख्या और जमीन पर जीवित, समृद्ध और प्राकृतिक जंगल—दोनों एक बात नहीं हैं।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted