राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026
झारखंड में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों पर राहुल गांधी ने चुप्पी तोड़ते हुए साफ कहा है कि छात्रों की बात सुनी जानी चाहिए—सरकार कांग्रेस की हो, केंद्र की हो या झारखंड की। उनके इस बयान का राजनीतिक महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि छात्र आंदोलनों को लेकर राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में ऐसा रास्ता अपनाया है जिसमें वे छात्रों के मुद्दों के साथ मजबूती से खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन उनके आंदोलन पर कांग्रेस का झंडा लगाने या उसका राजनीतिक श्रेय लेने की जल्दबाजी नहीं करते। उनका संदेश सीधा है—छात्र किस सरकार के खिलाफ खड़े हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे सड़क पर क्यों खड़े हैं।
जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के दौरान भी यही रणनीति देखने को मिली थी। राहुल गांधी ने प्रदर्शन के शुरुआती दौर में आंदोलन से सावधानीपूर्ण दूरी बनाए रखी। कांग्रेस के बड़े चेहरों ने भी जंतर-मंतर पहुंचकर छात्रों के मंच को पार्टी के राजनीतिक मंच में बदलने की कोशिश नहीं की। इसका राजनीतिक फायदा यह हुआ कि सत्तापक्ष के लिए आंदोलन को सीधे ‘कांग्रेस प्रायोजित’ बताकर खारिज करना आसान नहीं रहा। आंदोलन की पहचान छात्रों, उनकी परीक्षाओं, पेपर लीक, भर्ती व्यवस्था और उनके भविष्य से जुड़े सवालों के साथ बनी रही। कांग्रेस ने आंदोलन को अपने हाथ में लेने के बजाय उसके मुद्दों के साथ खड़े होने का रास्ता चुना।
लेकिन तस्वीर उस दिन बदल गई जब प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई। राहुल गांधी इसके बाद प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने पर बैठ गए और सरकार को सीधे कठघरे में खड़ा किया। कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर पुलिस बल प्रयोग के बीच राहुल गांधी को भी हिरासत में लिया गया। हिरासत से बाहर आने के बाद चोटिल हालत और एक पैर में जूता नहीं होने वाली उनकी तस्वीर ने राजनीतिक रूप से बड़ा संदेश दिया। बिना लंबे भाषण के वह तस्वीर यह कह रही थी कि नेता प्रतिपक्ष छात्रों के सवाल को लेकर सड़क पर उतरे, पुलिस कार्रवाई का सामना किया और उस मुद्दे को सत्ता के दरवाजे तक लेकर गए।
यहीं राहुल गांधी की रणनीति का फर्क दिखाई देता है। उन्होंने छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में लेकर उसे कांग्रेस बनाम बीजेपी की लड़ाई बनाने के बजाय छात्रों को ही आंदोलन का चेहरा बने रहने दिया। राहुल गांधी और कांग्रेस ने समानांतर रूप से यह सवाल जरूर उठाया कि भारत की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था में आखिर ऐसा क्या टूट गया है कि युवाओं को परीक्षा देने, परिणाम पाने, नौकरी हासिल करने और निष्पक्ष भर्ती जैसी बुनियादी मांगों के लिए भी सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। दूसरे शब्दों में, कांग्रेस ने आंदोलन को ‘हाइजैक’ करने के बजाय उसके मूल सवाल—भारतीय शिक्षा और भर्ती व्यवस्था के संकट—को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश की।
अब झारखंड के आंदोलनकारी छात्रों पर राहुल गांधी का बयान इसी राजनीतिक लाइन को और महत्वपूर्ण बनाता है। उन्होंने केवल बीजेपी सरकारों को छात्रों की बात सुनने की नसीहत नहीं दी। उनका संदेश इससे आगे जाता है—सरकार किसी की भी हो, आंदोलन और अनशन कर रहे छात्रों को सुनना पड़ेगा। यही बात उनके बयान को राजनीतिक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि झारखंड में सवाल केवल किसी विरोधी दल की सरकार को घेरकर राजनीतिक फायदा उठाने का नहीं है। राहुल गांधी का रुख यह संदेश देता है कि छात्र और युवाओं के सवालों की कसौटी सरकार का राजनीतिक रंग नहीं होना चाहिए।
यदि राहुल गांधी का यही सिद्धांत कांग्रेस और उसके सहयोगियों की सरकारों पर भी समान रूप से लागू होता है, तो यह भारतीय राजनीति की उस परिचित परंपरा से अलग रुख होगा जिसमें विपक्ष में रहते हुए छात्र आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकार दिखाई देता है और सत्ता में पहुंचने के बाद वही आंदोलन अक्सर कानून-व्यवस्था की समस्या बन जाता है। राहुल गांधी का संदेश कम से कम फिलहाल यही कहता दिखाई देता है कि किसी छात्र की शिकायत या आंदोलन का महत्व इस आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए कि सामने बीजेपी की सरकार है, कांग्रेस की है या किसी सहयोगी दल की।
यही राहुल गांधी के इस रुख की असली परीक्षा भी है। यदि किसी कांग्रेस शासित राज्य में छात्र भर्ती, परीक्षा, पेपर लीक या शिक्षा व्यवस्था को लेकर आंदोलन करते हैं तो क्या कांग्रेस वहां भी यही रवैया अपनाएगी? यदि किसी सहयोगी दल की सरकार के खिलाफ युवा सड़क पर उतरते हैं तो क्या राहुल गांधी वहां भी उतनी ही मजबूती से कहेंगे कि पहले छात्रों को सुनिए? झारखंड को लेकर उनका ताजा बयान कम से कम इस दिशा में संकेत जरूर देता है कि वे युवाओं के सवालों को पार्टी की राजनीतिक सुविधा से ऊपर एक व्यापक राष्ट्रीय समस्या के रूप में पेश करना चाहते हैं।
और शायद यही वह जगह है जहां राहुल गांधी की मौजूदा राजनीति पहले के मुकाबले अधिक सधी हुई दिखाई देती है। सड़क पर उतरना जरूरी हुआ तो उतरेंगे, हिरासत होगी तो उसका सामना करेंगे, सरकार से सवाल पूछेंगे—लेकिन जिस आंदोलन का नेतृत्व छात्र खुद कर रहे हैं, उसके सामने कांग्रेस का विशाल राजनीतिक पोस्टर खड़ा करके उसका श्रेय लेने की जल्दबाजी नहीं करेंगे। यह रणनीति कांग्रेस को छात्र आंदोलन का मालिक बनाने के बजाय उसके मुद्दों का राजनीतिक सहयोगी बनाती है।
इस रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। किसी जन आंदोलन के लिए सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब उसका मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और पूरी बहस राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है। छात्र अगर पेपर लीक, भर्ती में देरी, परीक्षा व्यवस्था या नौकरियों के लिए लड़ रहे हैं और अचानक पूरा विमर्श राहुल गांधी बनाम बीजेपी में बदल जाए, तो नुकसान अंततः छात्रों के मुद्दे का ही होगा। जंतर-मंतर के आंदोलन से शुरुआती दूरी और बाद में पुलिस कार्रवाई के सवाल पर सीधे हस्तक्षेप को इसी राजनीतिक संतुलन के तौर पर देखा जा सकता है—आंदोलन छात्रों का रहे, लेकिन उनकी आवाज दबे तो विपक्ष उनके साथ खड़ा हो।
भारत में शिक्षा और रोजगार का संकट किसी एक पार्टी या एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपर लीक, परीक्षाओं में देरी, भर्ती प्रक्रियाओं का वर्षों तक लटकना, परिणामों को लेकर विवाद और सरकारी नौकरी की तैयारी में युवाओं के जीवन के कई महत्वपूर्ण साल निकल जाना—ये समस्याएं यह देखकर किसी परिवार का दरवाजा नहीं खटखटातीं कि वह बीजेपी को वोट देता है, कांग्रेस को या किसी क्षेत्रीय दल को। इनका असर हर उस परिवार पर पड़ता है जिसने अपने बेटे या बेटी की पढ़ाई, कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं पर वर्षों की कमाई के साथ अपनी उम्मीदें भी लगा रखी हैं।
युवा जब सड़क पर उतरता है तो उसके हाथ में केवल कोई पोस्टर या नारा नहीं होता। उसके पीछे कई वर्षों की तैयारी, परिवार का पैसा, माता-पिता की उम्मीदें और अपने भविष्य को लेकर बेचैनी होती है। एक परीक्षा रद्द होने, पेपर लीक होने या भर्ती वर्षों तक अटकने का अर्थ सरकारी फाइल में केवल एक प्रशासनिक समस्या हो सकता है, लेकिन किसी अभ्यर्थी के लिए इसका अर्थ उसकी जिंदगी के दो-तीन महत्वपूर्ण साल हो सकता है। यही वजह है कि छात्र आंदोलनों को केवल कानून-व्यवस्था या राजनीतिक विरोध के चश्मे से देखना समस्या को छोटा कर देना है।
इसीलिए राहुल गांधी की यह बात राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा मायने रखती है कि सरकार चाहे किसी की हो, छात्रों को सुनना होगा। यदि यह केवल एक बयान नहीं बल्कि उनकी स्थायी राजनीतिक लाइन बनती है और कांग्रेस अपनी सरकारों तथा सहयोगियों पर भी यही कसौटी लागू करती है, तो छात्र और युवा आंदोलनों को लेकर राहुल गांधी की राजनीतिक विश्वसनीयता कहीं ज्यादा मजबूत हो सकती है। क्योंकि किसी नेता की निष्पक्षता की असली परीक्षा तब नहीं होती जब वह अपने विरोधी की सरकार को कठघरे में खड़ा करता है; परीक्षा तब होती है जब वही सवाल उसकी अपनी पार्टी या राजनीतिक सहयोगियों के सामने खड़ा हो।
राहुल गांधी के लिए भी यह रास्ता आसान नहीं है। युवाओं की आवाज को पार्टी की सीमाओं से ऊपर रखने की बात कहना एक चीज है और हर राज्य में उस सिद्धांत पर कायम रहना दूसरी। आने वाले समय में यदि कांग्रेस या उसके सहयोगियों की किसी सरकार के खिलाफ ऐसा ही बड़ा छात्र आंदोलन खड़ा होता है, तो राहुल गांधी के आज के शब्द उसी समय उनके सामने कसौटी बनकर खड़े होंगे। लेकिन फिलहाल झारखंड के छात्रों पर उनका रुख यह संकेत जरूर देता है कि वे इस मुद्दे को केवल बीजेपी बनाम कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई तक सीमित नहीं रखना चाहते।
फिलहाल एक बात साफ दिखाई देती है—राहुल गांधी ने छात्रों के आंदोलन को अपने नाम से जोड़ने के बजाय अपने नाम को छात्रों के मुद्दे से जोड़ने का रास्ता चुना है। दोनों बातें सुनने में लगभग एक जैसी लग सकती हैं, लेकिन राजनीति में इनके बीच बड़ा फर्क है। पहला आंदोलन का राजनीतिक अधिग्रहण होता, जबकि दूसरा उसके पीछे खड़े होने की रणनीति है। जंतर-मंतर पर कांग्रेस के बड़े चेहरों की गैरमौजूदगी और पुलिस कार्रवाई के बाद राहुल गांधी का खुद सड़क पर उतरना इसी फर्क को रेखांकित करता है।
और शायद इसीलिए राहुल गांधी की हालिया राजनीति को देखकर वह चुटीली टिप्पणी भी सुनाई देती है—“भाई, आजकल राहुल गांधी क्या खा रहे हैं? समझदारी की बातें कुछ ज्यादा ही कर रहे हैं।” इसका जवाब खाने की मेज पर नहीं, उनकी राजनीतिक रणनीति में दिखाई देता है—छात्रों की लड़ाई छात्रों की रहने दीजिए, लेकिन जब सत्ता उनकी आवाज सुनने से इनकार करे तो विपक्ष उनके पीछे पूरी ताकत से खड़ा दिखाई दे।




