राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 7 अगस्त 2026
देश में छात्र आंदोलनों, Gen Z के बढ़ते असंतोष और युवाओं के विरोध को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट संदेश दिया है—अगर Gen Z विरोध प्रदर्शन कर रही है तो इससे वह देशविरोधी नहीं हो जाती; ये युवा हमारे अपने हैं और हमारी अगली पीढ़ी हैं। मुंबई में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आज की नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ियों की तरह बिना सवाल किए हर बात स्वीकार करने वाली नहीं है। वह सवाल करती है, तर्क मांगती है और किसी बात को मानने से पहले उसका तार्किक जवाब चाहती है। भागवत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़ी संख्या में युवाओं के प्रदर्शन तथा 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
भागवत ने पीढ़ियों के बीच आए बदलाव का जिक्र करते हुए कहा कि जब वे युवा थे तो अपने से बड़ों की बातें सुनते थे और आमतौर पर सवाल नहीं करते थे, लेकिन आज की Gen Z वैसी नहीं है। नई पीढ़ी को तार्किक जवाब चाहिए। उन्होंने Gen Z को लेकर नकारात्मक धारणा को खारिज करते हुए कहा कि अगर युवा प्रदर्शन कर रहे हैं तो उन्हें देशविरोधी नहीं माना जाना चाहिए। वे इसी देश के लोग हैं और देश की अगली पीढ़ी हैं। भागवत ने यहां तक कहा कि उनके विचार में Gen Z और Gen Alpha मौजूदा पीढ़ी की तुलना में अधिक ईमानदार हैं और देशभक्ति तथा सेवा की ईमानदार अपील उन तक प्रभावी ढंग से पहुंचती है।
भागवत की इस टिप्पणी का संदर्भ हाल में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन से भी जुड़ता है। NEET पेपर लीक को लेकर हुए इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवा और Gen Z छात्र शामिल हुए थे। 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज और पैलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। भागवत ने इस पुलिस कार्रवाई का सीधे बचाव करने के बजाय सवाल उठाया कि आखिर लाठीचार्ज क्यों हुआ और पैलेट गन का इस्तेमाल क्यों किया गया। उन्होंने कहा कि वे नहीं जानते कि पुलिस को ऐसी कार्रवाई क्यों करनी पड़ी और इसके कारणों का अध्ययन किया जाना चाहिए। यानी RSS प्रमुख ने एक तरफ युवाओं के विरोध के अधिकार को देशविरोध से अलग किया, वहीं दूसरी तरफ पुलिस की कार्रवाई के पीछे की परिस्थितियों की पड़ताल की जरूरत भी बताई।
यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हाल के छात्र आंदोलनों में सबसे बड़ी राजनीतिक बहस केवल छात्रों की मांगों पर नहीं, बल्कि उनके आंदोलन की वैधता और उसके पीछे संभावित राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी रही है। ऐसे माहौल में RSS प्रमुख का यह कहना कि प्रदर्शन करने वाला Gen Z युवा देशविरोधी नहीं है, विरोध और राष्ट्रभक्ति के बीच खींची जाने वाली कृत्रिम रेखा पर महत्वपूर्ण टिप्पणी है। लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना, परीक्षा व्यवस्था पर जवाब मांगना या शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों पर सड़क पर उतरना अपने आप में किसी व्यक्ति की देशभक्ति पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता—भागवत के बयान का व्यापक संदेश इसी दिशा में जाता दिखाई देता है।
छात्र आंदोलन के साथ-साथ मोहन भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि शिक्षा क्षेत्र की समस्याएं इतनी व्यापक हैं कि एक-दो सुधारों से काम नहीं चलेगा। उन्होंने शिक्षा को कारोबार की तरह देखने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “शिक्षा व्यवसाय नहीं है” और इसे सभी तक पहुंचाना जरूरी है। इसके लिए फीस संरचना पर भी काम करना होगा। उन्होंने शिक्षा पर भारत के बजट का हिस्सा बढ़ाकर 6% किए जाने की मांग का समर्थन किया।
भागवत ने शिक्षा व्यवस्था में जनभागीदारी और शिक्षकों के प्रशिक्षण को भी अहम बताया। उनके मुताबिक स्कूलों के विकास से लेकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समाज की भागीदारी जरूरी है और शिक्षक प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। उनका जोर इस बात पर था कि शिक्षा का उद्देश्य लोगों को शिक्षित करना होना चाहिए, न कि इसे केवल मुनाफे के व्यवसाय के रूप में देखा जाए। ऐसे समय में जब पेपर लीक, महंगी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, भर्ती में देरी और युवाओं के भविष्य को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, RSS प्रमुख का शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की जरूरत स्वीकार करना राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है।
भागवत की बात का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि नई पीढ़ी को आदेश देकर चुप कराने के बजाय उसके सवालों का जवाब देना होगा। Gen Z इंटरनेट, सोशल मीडिया और सूचना के बेहद तेज दौर में बड़ी हुई पीढ़ी है। उसके सामने केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि व्यवस्था पर भरोसा रखिए। वह पूछती है कि पेपर कैसे लीक हुआ, जिम्मेदार कौन है, परीक्षा क्यों रद्द हुई, भर्ती वर्षों तक क्यों अटकी और विरोध करने पर पुलिस कार्रवाई क्यों हुई। भागवत ने इसी बदलाव को स्वीकार करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी तार्किक उत्तर चाहती है।
उनका बयान जंतर-मंतर की पुलिस कार्रवाई पर चल रही बहस को भी नई दिशा देता है। यदि छात्रों पर लाठीचार्ज और पैलेट गन के इस्तेमाल के कारणों की जांच जरूरी है, जैसा भागवत कह रहे हैं, तो सवाल केवल पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि बल प्रयोग का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया, उसका कानूनी और प्रशासनिक आधार क्या था और क्या उपलब्ध दूसरे विकल्पों के मुकाबले यह कार्रवाई आवश्यक और अनुपातिक थी। खासकर पैलेट गन जैसे साधन के कथित इस्तेमाल को लेकर उठे सवालों का जवाब इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे गंभीर चोट का खतरा जुड़ा होता है।
RSS प्रमुख ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर भी अलग स्वर में बात की। पाकिस्तान और चीन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देशों के बीच संघर्ष होने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि द्विपक्षीय रिश्ते हमेशा के लिए खत्म कर दिए जाएं। उनके मुताबिक विवाद के दौरान संबंध कुछ समय के लिए रोके जा सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह समाप्त कर देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और चीन को भी भारत का पूरी तरह और स्थायी दुश्मन मानकर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि देशों के रिश्तों में राज्य की राजनीति और परिस्थितियों की भी भूमिका होती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघर्ष के समय देश के लोगों को सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए।
लेकिन भागवत के पूरे संबोधन में सबसे ज्यादा राजनीतिक और सामाजिक असर पैदा करने वाली बात Gen Z को लेकर उनका रुख है। “विरोध कर रहे हैं तो देशविरोधी नहीं हैं”—यह वाक्य छात्र आंदोलनों को देखने के नजरिए पर एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इसके साथ लाठीचार्ज और पैलेट गन पर सवाल तथा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग जोड़ दें तो उनका संदेश केवल युवाओं की तारीफ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था से भी जवाब मांगता दिखाई देता है।
अब सवाल यह है कि भागवत की इस सोच का असर सत्ता और प्रशासन के व्यवहार में कितना दिखाई देता है। यदि नई पीढ़ी वास्तव में अधिक सवाल पूछती है और उसे तार्किक जवाब चाहिए, तो उसका जवाब केवल पुलिस, बैरिकेड और हिरासत नहीं हो सकते। उसके सवालों का जवाब बेहतर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शी भर्ती, सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा जवाबदेह शासन से देना होगा।
मोहन भागवत ने Gen Z को लेकर कम से कम एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी है—सवाल पूछने वाला युवा देश का विरोधी नहीं, देश का भविष्य है। और यदि वही युवा सड़क पर उतर रहा है, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर उसे सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी।




