राष्ट्रीय/ जम्मू कश्मीर | ABC NATIONAL NEWS | श्रीनगर | 6 अगस्त 2026
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात साल पूरे होने के बीच प्रदेश के राजनीतिक भविष्य, पूर्ण राज्य के दर्जे और स्थानीय लोगों की जमीन तथा सरकारी नौकरियों की सुरक्षा का सवाल एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराते हुए कहा है कि यहां के लोगों की जमीन और सार्वजनिक रोजगार की सुरक्षा के लिए ठोस संवैधानिक संरक्षण दिया जाना चाहिए। कांग्रेस सांसद डॉ. सैयद नासिर हुसैन ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को उसके पुराने आश्वासनों की याद दिलाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से पूछा है कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने का बार-बार दिया गया भरोसा आखिर कब पूरा होगा।
डॉ. सैयद नासिर हुसैन ने अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के सात वर्ष पूरे होने के संदर्भ में कहा कि जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए जमीन और सार्वजनिक रोजगार की संवैधानिक सुरक्षा कांग्रेस की प्रमुख मांगों में शामिल है। कांग्रेस का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के भविष्य की चर्चा केवल प्रशासनिक व्यवस्था तक सीमित नहीं रह सकती। सवाल यह भी है कि यहां के लोगों को अपनी जमीन और रोजगार पर किस तरह की सुरक्षा मिलेगी और वह राजनीतिक अधिकार तथा प्रतिनिधित्व कब पूरी तरह बहाल होगा जो एक पूर्ण राज्य के नागरिकों को प्राप्त होता है। इसी के साथ पार्टी ने साफ किया कि उसकी मांग केवल ‘स्टेटहुड’ नहीं, बल्कि पूर्ण राज्य का दर्जा है।
नासिर हुसैन ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के पूर्व में दिए गए आश्वासनों का जिक्र करते हुए कहा कि देश को बार-बार भरोसा दिलाया गया कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल किया जाएगा, लेकिन ये आश्वासन अब तक पूरे नहीं हुए हैं। कांग्रेस सांसद के इस बयान ने एक बार फिर उस मूल राजनीतिक प्रश्न को सामने ला दिया है जो अगस्त 2019 के बाद से लगातार जम्मू-कश्मीर की राजनीति में बना हुआ है—यदि राज्य का दर्जा लौटाया जाना है तो इसकी स्पष्ट समयसीमा क्या है? कांग्रेस अब इसी मुद्दे पर केंद्र से ठोस निर्णय चाहती है।
जमीन और नौकरियों की सुरक्षा क्यों बनी बड़ा मुद्दा?
कांग्रेस ने राज्य के दर्जे के साथ जिस दूसरे मुद्दे पर विशेष जोर दिया है, वह जम्मू-कश्मीर के निवासियों की जमीन और सरकारी नौकरियों की सुरक्षा है। पार्टी चाहती है कि स्थानीय आबादी के हितों की रक्षा केवल सामान्य प्रशासनिक आदेशों पर निर्भर न रहे, बल्कि इसके लिए संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। नासिर हुसैन का कहना है कि जमीन और सार्वजनिक रोजगार की सुरक्षा जम्मू-कश्मीर के लोगों से सीधे जुड़ा विषय है और इसे उनके भविष्य, आर्थिक सुरक्षा तथा पहचान से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
यह मांग इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आया। 2019 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए। इसके साथ ही दशकों पुरानी संवैधानिक व्यवस्था बदल गई। सात साल बाद कांग्रेस अब सवाल उठा रही है कि अस्थायी बताई गई केंद्र शासित प्रदेश की व्यवस्था कब समाप्त होगी और जम्मू-कश्मीर को दोबारा पूर्ण राज्य का स्वरूप कब मिलेगा।
‘वादा किया है तो पूरा कब होगा?’
कांग्रेस का राजनीतिक हमला इसी बिंदु पर केंद्रित है। पार्टी का कहना है कि जब केंद्र सरकार के सर्वोच्च स्तर से राज्य का दर्जा लौटाने की बात कही जा चुकी है, तब सात वर्ष बाद भी इस मुद्दे का समाधान लंबित क्यों है। नासिर हुसैन ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को उन्हीं आश्वासनों की याद दिलाकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की है। उनका संदेश स्पष्ट है—अब केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं हैं, जम्मू-कश्मीर के लोगों को निर्णय और समयसीमा चाहिए।
इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और विधानसभा होने के बावजूद पूर्ण राज्य का दर्जा अलग संवैधानिक और प्रशासनिक महत्व रखता है। निर्वाचित प्रतिनिधित्व की बहाली एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि राजनीतिक प्रक्रिया को पूर्णता तभी मिलेगी जब जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा भी वापस आए और स्थानीय हितों को प्रभावी सुरक्षा मिले।
सात साल बाद भी 5 अगस्त के फैसले पर राजनीतिक टकराव कायम
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को प्राप्त विशेष संवैधानिक प्रावधानों को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाया था और बाद में राज्य का पुनर्गठन किया गया। उस फैसले को लेकर देश में शुरू हुई राजनीतिक बहस सात साल बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। केंद्र और बीजेपी इसे जम्मू-कश्मीर को देश की मुख्यधारा की संवैधानिक व्यवस्था से पूरी तरह जोड़ने वाले ऐतिहासिक परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं, जबकि विपक्षी दलों ने विशेष रूप से राज्य का दर्जा खत्म किए जाने, स्थानीय अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल लगातार उठाए हैं।
अब कांग्रेस ने अपनी मांग को अनुच्छेद 370 की पुरानी स्थिति की बहस तक सीमित रखने के बजाय राज्य का दर्जा, जमीन और रोजगार की संवैधानिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर केंद्रित किया है। इससे राजनीतिक बहस का फोकस भी बदलता दिखाई देता है। प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि सात साल पहले क्या हुआ था, बल्कि यह भी है कि जम्मू-कश्मीर की अगली संवैधानिक व्यवस्था कैसी होगी और स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा किस रूप में सुनिश्चित की जाएगी।
मोदी सरकार के सामने अब जवाब और समयसीमा का सवाल
केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल राज्य का दर्जा बहाल करने की समयसीमा का है। यदि सरकार जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने के अपने घोषित रुख पर कायम है, तो विपक्ष जानना चाहता है कि वह दिन कब आएगा। कांग्रेस इसी राजनीतिक बिंदु को आगे बढ़ा रही है और प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री के पुराने आश्वासनों को सरकार के सामने रख रही है।
जम्मू-कश्मीर का मामला केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई भर नहीं है। यह लाखों लोगों के राजनीतिक अधिकारों, रोजगार, जमीन, प्रशासन और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। सात साल बाद यदि राज्य के दर्जे की मांग फिर इतनी मजबूती से सामने आ रही है, तो यह बताता है कि 2019 के फैसलों के बाद शुरू हुई राजनीतिक प्रक्रिया अभी अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंची है।
कांग्रेस सांसद डॉ. सैयद नासिर हुसैन के बयान ने इसलिए बहस को फिर एक स्पष्ट सवाल पर लाकर खड़ा कर दिया है—प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने का भरोसा दिया था, तो वह भरोसा वास्तविकता में कब बदलेगा? कांग्रेस की मांग है कि जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले, स्थानीय लोगों की जमीन और सरकारी नौकरियों को संवैधानिक सुरक्षा दी जाए और केंद्र अब आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस फैसला करे।




