ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026
कांग्रेस से मिली राजनीतिक पहचान, BJP में पहुंचते ही उसी कांग्रेस पर सबसे तीखा प्रहार
भारतीय राजनीति में पार्टी बदलना अब न तो असाधारण घटना है और न ही किसी नेता के लिए राजनीतिक अपराध। परिस्थितियां बदलती हैं, नेतृत्व से मतभेद होते हैं और कभी-कभी विचार भी बदलते हैं। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब दशकों तक किसी राजनीतिक दल से पहचान, पद, अवसर और राष्ट्रीय मंच पाने वाला नेता नया ठिकाना मिलते ही अपने पुराने राजनीतिक परिवार को लगभग पूरी तरह खारिज करने लगे। सुष्मिता देव का मामला इसी कारण दिलचस्प है। उनका राजनीतिक जीवन कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI से शुरू हुआ, वह कांग्रेस के टिकट पर सांसद बनीं, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी तक पहुंचीं और लंबे समय तक पार्टी के राष्ट्रीय चेहरे के रूप में दिखाई दीं। 2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी, TMC का दामन थामा और करीब पांच वर्ष बाद अब BJP में पहुंच गई हैं। BJP में नई पारी शुरू होने के कुछ ही समय बाद उनका कहना है कि “संघ परिवार गांधी परिवार से बेहतर है।” यही एक वाक्य उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा को फिर से पढ़ने के लिए मजबूर करता है। सवाल कांग्रेस की आलोचना करने के उनके अधिकार का नहीं है; सवाल यह है कि जो कमियां आज उन्हें इतनी गंभीर दिखाई दे रही हैं, वे दशकों तक कांग्रेस के भीतर महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए इतनी निर्णायक क्यों नहीं थीं?
कल तक गांधी परिवार के साथ राजनीतिक सफर, आज संघ परिवार में दिखाई दे रहा बेहतर भविष्य
सुष्मिता देव का कांग्रेस से रिश्ता किसी चुनाव के समय बने अवसरवादी गठबंधन जैसा नहीं था। उनकी राजनीतिक जड़ें उसी पार्टी में थीं और उनकी सार्वजनिक पहचान का बड़ा हिस्सा कांग्रेस के भीतर ही बना। फिर 2021 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर ममता बनर्जी की TMC चुनी। उस समय कांग्रेस से TMC की यात्रा को एक सीमा तक वैचारिक निरंतरता के रूप में भी समझा जा सकता था, क्योंकि ममता बनर्जी स्वयं कांग्रेस की राजनीति से निकली थीं और दोनों पार्टियां लंबे समय तक BJP की राजनीति के विरोधी खेमे में रही हैं। लेकिन TMC से BJP की यात्रा राजनीतिक रूप से बिल्कुल अलग छलांग है। यहां केवल पार्टी का झंडा नहीं बदलता, वैचारिक खेमे की दिशा भी बदल जाती है। इसलिए जब BJP में पहुंचने के तुरंत बाद सुष्मिता देव संघ परिवार को गांधी परिवार से बेहतर बताती हैं तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या इतने बड़े वैचारिक परिवर्तन की प्रक्रिया उनके भीतर वर्षों से चल रही थी, या नई पार्टी में प्रवेश के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य की दिशा को देखते हुए अपनी भाषा और प्राथमिकताएं भी उसी तेजी से बदल ली हैं? नेता को विचार बदलने का अधिकार है, लेकिन जनता को उस बदलाव का कारण पूछने का अधिकार भी उतना ही है।
‘गांधी परिवार से टकराकर कांग्रेस में बच नहीं सकते’—लेकिन फिर इतने वर्षों तक वहीं क्यों रहीं?
सुष्मिता देव ने कांग्रेस की कार्यसंस्कृति पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि गांधी परिवार से टकराकर कोई कांग्रेस में राजनीतिक रूप से बच नहीं सकता और यदि शीर्ष नेतृत्व में कोई आपसे नाराज हो जाए तो आपका करियर खत्म हो सकता है। यह मामूली आरोप नहीं है। कांग्रेस में हाईकमान संस्कृति, केंद्रीकृत निर्णय प्रक्रिया और शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं, इसलिए देव के अनुभव को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह अब BJP में हैं। लेकिन उनके बयान से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है। यदि व्यवस्था इतनी कठोर थी कि असहमति से राजनीतिक करियर समाप्त हो सकता था, तो वह इतने लंबे समय तक उसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा कैसे बनी रहीं? महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे पद तक कैसे पहुंचीं और पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का भरोसा कैसे हासिल करती रहीं? संभव है कि समय के साथ उनका अनुभव बदला हो, मतभेद बढ़े हों और अंततः कांग्रेस से मोहभंग हुआ हो। मगर तब उस पूरी वैचारिक यात्रा को विस्तार से सामने रखना चाहिए। केवल BJP में प्रवेश के बाद ‘संघ परिवार बेहतर, गांधी परिवार खराब’ का द्वंद्व खड़ा कर देना गंभीर राजनीतिक आत्ममंथन कम और नया राजनीतिक संदेश अधिक दिखाई देता है।
संघ की प्रशंसा महज तारीफ नहीं, BJP की राजनीति में इसका अपना संदेश है
RSS और BJP के संबंधों को समझने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि संघ की सार्वजनिक प्रशंसा का राजनीतिक अर्थ साधारण नहीं होता। BJP में दूसरे दलों से आने वाले नेताओं के सामने केवल पार्टी सदस्यता हासिल करने की चुनौती नहीं होती, उन्हें संगठन और उसके व्यापक वैचारिक परिवेश में विश्वसनीयता भी बनानी होती है। ऐसे समय में सुष्मिता देव का सीधे ‘गांधी परिवार बनाम संघ परिवार’ का फ्रेम खड़ा करना और संघ परिवार को श्रेष्ठ बताना राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। उनके आलोचक इसे स्वाभाविक रूप से संघ को साधने और BJP के भीतर अपनी वैचारिक विश्वसनीयता स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखेंगे। हो सकता है देव वास्तव में संघ की संगठनात्मक शैली से प्रभावित हुई हों, लेकिन तब प्रश्न यह है कि वह कौन-सा अनुभव था जिसने दशकों की कांग्रेस राजनीति और पांच वर्ष की TMC राजनीति के बाद अचानक उनके भीतर संघ को लेकर इतनी मजबूत सकारात्मक धारणा पैदा कर दी? यदि वह इस परिवर्तन की वैचारिक वजह विस्तार से बताएंगी तो उनकी बात अधिक विश्वसनीय होगी; अन्यथा राजनीतिक विरोधियों को यह कहने का अवसर मिलता रहेगा कि नई पार्टी में प्रवेश के साथ नई प्रशस्ति भी शुरू हो गई है।
क्या मंत्री पद या बड़ी जिम्मेदारी की जमीन तैयार हो रही है?
यहीं वह सवाल आता है जो राजनीतिक गलियारों में स्वाभाविक रूप से पूछा जाएगा—क्या सुष्मिता देव BJP में केवल कार्यकर्ता बनने आई हैं या उनकी निगाह किसी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी पर भी है? राजनीति करने वाला कोई व्यक्ति पद और जिम्मेदारी की आकांक्षा रखता है तो इसमें अपने आप में कुछ अनुचित नहीं है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह तथ्य स्थापित नहीं है कि BJP ने उन्हें मंत्री पद का कोई आश्वासन दिया है अथवा उन्होंने मंत्री बनने की कोई औपचारिक मांग रखी है। इसलिए ‘मंत्री बनने की व्याकुलता’ को तथ्य के बजाय राजनीतिक सवाल और आलोचनात्मक व्याख्या के रूप में ही देखना चाहिए। फिर भी जिस तेजी से उन्होंने अपने पुराने राजनीतिक परिवार की आलोचना और संघ की प्रशंसा शुरू की है, उससे यह सवाल जरूर उठता है कि क्या वह BJP नेतृत्व और संघ के बीच यह संदेश पहुंचाना चाहती हैं कि उनका परिवर्तन केवल चुनावी दल-बदल नहीं बल्कि पूर्ण राजनीतिक और वैचारिक पुनर्स्थापन है। यदि भविष्य में उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी मिलती है तो आज दिए जा रहे इन बयानों को उस राजनीतिक यात्रा के शुरुआती संकेत के रूप में फिर पढ़ा जाएगा।
तीन पार्टियां, तीन पड़ाव और हर पड़ाव पर बदलती राजनीतिक कहानी
सुष्मिता देव की यात्रा आज की भारतीय राजनीति के उस दौर का प्रतिनिधित्व करती है जहां किसी नेता की राजनीतिक जीवनी को केवल एक विचारधारा के आधार पर पढ़ना मुश्किल होता जा रहा है। कांग्रेस में लंबा जीवन, फिर TMC और अब BJP—तीनों पार्टियों की राजनीतिक संस्कृति, नेतृत्व शैली और वैचारिक स्थिति एक जैसी नहीं हैं। कांग्रेस छोड़ते समय TMC उनके लिए स्वीकार्य विकल्प बनी और अब TMC भी पीछे छूट गई। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि सुष्मिता देव ने तीन पार्टियां क्यों बदलीं। ज्यादा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस पूरी यात्रा में उनका अपना स्थायी राजनीतिक विचार क्या रहा? कौन-से सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें उन्होंने कांग्रेस में रहते हुए भी माना, TMC में रहते हुए भी और BJP में आने के बाद भी? यदि किसी राजनेता की हर नई राजनीतिक मंजिल के साथ उसके पुराने विश्वास भी बदलते दिखाई दें तो मतदाता यह पूछेगा कि उसकी मूल राजनीतिक पहचान आखिर है क्या—विचार, क्षेत्र, नेतृत्व, अवसर या सत्ता में प्रभावी भूमिका हासिल करने की इच्छा?
RSS इतना बेहतर था तो यह अनुभूति कांग्रेस और TMC में रहते हुए क्यों नहीं हुई?
यही इस पूरे विवाद का सबसे सरल और शायद सबसे असुविधाजनक प्रश्न है। यदि संघ परिवार की संगठनात्मक संस्कृति गांधी परिवार की राजनीति से इतनी बेहतर है तो सुष्मिता देव को इसका एहसास कब हुआ? क्या कांग्रेस छोड़ते समय? क्या TMC के पांच वर्षों के दौरान? या BJP में शामिल होने के बाद? यदि वह वर्षों से संघ की संगठनात्मक कार्यप्रणाली से प्रभावित थीं तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह बात पहले क्यों नहीं कही? और यदि यह अनुभव BJP में आने के बाद हुआ है तो इतने कम समय में उन्होंने संघ परिवार के बारे में इतना निर्णायक निष्कर्ष कैसे निकाल लिया? यह व्यंग्य का नहीं बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न है। किसी संस्था की आलोचना वर्षों के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर की जा सकती है, लेकिन दूसरी संस्था को श्रेष्ठ घोषित करने के लिए भी अनुभव और कसौटी चाहिए। वरना जनता को यही दिखाई देगा कि राजनीतिक पता बदला और उसके साथ राजनीतिक शब्दकोश भी बदल गया।
कांग्रेस की कमियां वास्तविक हो सकती हैं, मगर क्या BJP और संघ उसी कसौटी पर परखे जाएंगे?
सुष्मिता देव की कांग्रेस संबंधी शिकायतों को केवल इसलिए गलत घोषित करना उचित नहीं होगा क्योंकि वह आज BJP में हैं। कांग्रेस के भीतर नेतृत्व के केंद्रीकरण, संगठनात्मक चुनावों, निर्णय प्रक्रिया और हाईकमान संस्कृति पर पार्टी के भीतर और बाहर लंबे समय से बहस होती रही है। लेकिन निष्पक्षता की मांग है कि जो कसौटी देव कांग्रेस पर लगा रही हैं, वही BJP और RSS पर भी लगाएं। यदि कल BJP नेतृत्व किसी राजनीतिक प्रश्न पर उनकी राय से असहमत होता है, यदि टिकट वितरण में उनकी इच्छा नहीं मानी जाती, यदि संगठन के किसी फैसले से उन्हें नुकसान होता है या यदि सरकार की किसी नीति से उनका बुनियादी मतभेद पैदा होता है, तब क्या वह उतनी ही स्पष्टता से बोलेंगी जितनी स्पष्टता से आज गांधी परिवार पर बोल रही हैं? किसी संगठन की लोकतांत्रिकता की सबसे बड़ी परीक्षा तब नहीं होती जब नया सदस्य उसकी प्रशंसा कर रहा हो; असली परीक्षा तब होती है जब वही सदस्य असहमति व्यक्त करता है।
असली परीक्षा BJP से असहमति के दिन होगी, स्वागत के दिनों में नहीं
आज सुष्मिता देव BJP में नई हैं और स्वाभाविक रूप से उनके लिए स्वागत और राजनीतिक संभावनाओं का दौर है। ऐसे समय में संघ और BJP की प्रशंसा करना आसान है। लेकिन उनके ‘संघ परिवार बेहतर’ वाले दावे की वास्तविक परीक्षा किसी ऐसे दिन होगी जब उनका मत पार्टी नेतृत्व से अलग होगा। क्या तब भी उन्हें अपनी बात रखने की वही स्वतंत्रता महसूस होगी जिसकी कमी वह कांग्रेस में बताती हैं? क्या वह BJP के किसी बड़े नेता की खुलकर आलोचना कर पाएंगी? क्या संघ की किसी रणनीति से असहमति होने पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा पाएंगी और फिर भी उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित रहेगा? यदि इसका उत्तर व्यवहार में ‘हां’ निकलता है तो उनकी आज की बात को गंभीरता से स्वीकार करने का मजबूत आधार होगा। लेकिन यदि भविष्य में वह केवल नई पार्टी की आधिकारिक लाइन दोहराती दिखाई देती हैं तो आज का बयान वैचारिक हृदय परिवर्तन से ज्यादा राजनीतिक अनुकूलन के रूप में याद किया जाएगा।
सत्ता के करीब पहुंचते ही पुराने घर में केवल अंधेरा और नए घर में केवल उजाला क्यों दिखता है?
भारतीय राजनीति की यह पुरानी विडंबना है। नेता जिस पार्टी में रहता है, वहां उसे राष्ट्रहित, लोकतंत्र, नेतृत्व और संगठन दिखाई देता है; पार्टी छोड़ते ही उसी जगह उसे तानाशाही, परिवारवाद और अवसरहीनता दिखाई देने लगती है। जिस पार्टी के खिलाफ वर्षों तक भाषण देता है, उसमें शामिल होते ही वही संगठन उसे अनुशासित, लोकतांत्रिक और राष्ट्रहितैषी दिखाई देने लगता है। समस्या विचार बदलने में नहीं है, समस्या इस असाधारण गति से बदलते राजनीतिक सत्य में है। यदि कल तक किसी विचारधारा को गलत बताया जा रहा था और आज उसी को श्रेष्ठ बताया जा रहा है तो बीच की वैचारिक यात्रा का हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए। लोकतंत्र केवल नेताओं के दल बदलने की स्वतंत्रता का नाम नहीं है; वह मतदाताओं के सवाल पूछने की स्वतंत्रता का भी नाम है।
संघ को प्रमाणपत्र देने से पहले अपने राजनीतिक परिवर्तन का हिसाब भी देना होगा
सुष्मिता देव को RSS पसंद है तो वह उसकी प्रशंसा करें। उन्हें कांग्रेस नेतृत्व से शिकायत है तो खुलकर आलोचना करें। यही लोकतंत्र है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में विश्वसनीयता केवल यह बताने से नहीं बनती कि आज कौन अच्छा लग रहा है; यह बताने से भी बनती है कि कल जिसे अच्छा बताया था, वह आज अचानक इतना खराब कैसे हो गया। कांग्रेस ने उन्हें अवसर दिए, पद दिए और राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान दी—इस ऐतिहासिक तथ्य को उनकी वर्तमान आलोचना मिटा नहीं सकती। उसी तरह कांग्रेस की सदस्य रही होने का अर्थ यह भी नहीं कि उन्हें जीवनभर उसकी प्रशंसा करनी होगी। अपेक्षा केवल राजनीतिक ईमानदारी की है—अपने पुराने अनुभव की कमियां बताइए, लेकिन नई निष्ठा साबित करने के लिए इतिहास को सुविधाजनक तरीके से दो हिस्सों में मत बांटिए।
मंत्री पद मिले या न मिले, संदेश BJP और संघ तक पहुंच चुका है
आने वाले समय में सुष्मिता देव को BJP क्या भूमिका देती है, यह देखना दिलचस्प होगा। उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारी मिलती है, चुनावी भूमिका दी जाती है, सरकार में अवसर मिलता है या वह सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती हैं—इसका फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा। लेकिन उनके ताजा बयान ने एक काम अभी ही कर दिया है। BJP और संघ परिवार तक यह संदेश स्पष्ट रूप से पहुंच गया है कि सुष्मिता देव अपने कांग्रेस अतीत से केवल संगठनात्मक दूरी नहीं बना रही हैं, बल्कि सार्वजनिक रूप से नई राजनीतिक पहचान को स्थापित करने के लिए तैयार हैं। इसलिए उनका बयान केवल कांग्रेस की आलोचना नहीं है; इसे BJP में उनके राजनीतिक पुनर्जन्म की घोषणा की तरह भी पढ़ा जा सकता है।
सवाल आखिर वही—हृदय परिवर्तन हुआ है या राजनीतिक पता बदलते ही विचार भी बदल गए?
सुष्मिता देव की कहानी का अंतिम फैसला आज नहीं हो सकता। संभव है कि आने वाले वर्षों में वह साबित करें कि उनका BJP में जाना गहरे वैचारिक पुनर्विचार का परिणाम था। संभव यह भी है कि वह संघ की संगठनात्मक शैली से सचमुच प्रभावित हुई हों। लेकिन इतनी बड़ी राजनीतिक यात्रा के तुरंत बाद ‘संघ परिवार गांधी परिवार से बेहतर’ जैसी घोषणा सवालों से मुक्त नहीं हो सकती। राजनीति में पार्टी बदलना आसान है, झंडा बदलना उससे भी आसान, मंच बदलना कुछ मिनटों का काम और भाषण बदलने में शायद उससे भी कम समय लगता है। सबसे कठिन काम यह साबित करना होता है कि नेता ने केवल राजनीतिक पता नहीं बदला, बल्कि उसके विचार सचमुच किसी गंभीर अनुभव और आत्ममंथन के बाद बदले हैं। फिलहाल सुष्मिता देव के सामने भी यही चुनौती है। कल तक गांधी परिवार के साथ लंबी राजनीतिक यात्रा और आज संघ परिवार को श्रेष्ठ बताने के बीच जो वैचारिक दूरी है, उसका जवाब किसी पद, किसी मंच या किसी नए नारे से नहीं—उनके आने वाले राजनीतिक आचरण से मिलेगा।




