ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 अगस्त 2026
2018 का फैसला, 2023 का बदलाव और कांग्रेस की एक लंबी राजनीतिक यात्रा
मध्य प्रदेश कांग्रेस की आज की स्थिति को समझने के लिए दतिया से सीधे शुरुआत करना पर्याप्त नहीं होगा। कहानी 2018 से शुरू करनी होगी, जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर संगठन की कमान सौंपी थी। उसी वर्ष कांग्रेस 114 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने। लेकिन सरकार लगभग 15 महीने ही चली। मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थक विधायकों के विद्रोह के बाद कांग्रेस सरकार गिर गई और बीजेपी सत्ता में लौट आई। इसके बावजूद प्रदेश संगठन में कमलनाथ का प्रभाव बना रहा। फिर आया 2023 का विधानसभा चुनाव, जिसमें कांग्रेस को सिर्फ 66 सीटें मिलीं और बीजेपी 163 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत से सत्ता में लौटी। इसी हार के बाद कांग्रेस हाईकमान ने मध्य प्रदेश में पीढ़ीगत बदलाव करते हुए दिसंबर 2023 में जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। इसे केवल अध्यक्ष बदलने के बजाय पुराने नेतृत्व मॉडल से बाहर निकलने की कोशिश के रूप में भी देखा गया।
कमलनाथ अध्याय के बाद कांग्रेस ने नई पीढ़ी पर लगाया दांव
2023 की हार के बाद कमलनाथ की जगह जीतू पटवारी की नियुक्ति ने साफ किया कि राहुल गांधी और कांग्रेस संगठन अब मध्य प्रदेश में अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को अवसर देना चाहते हैं। उस समय यह फैसला जोखिम से खाली नहीं था। पटवारी स्वयं 2023 में राऊ विधानसभा सीट हार चुके थे। उनके सामने बीजेपी का विशाल संगठन था, सत्ता में नई सरकार थी और कांग्रेस का मनोबल बुरी तरह टूटा हुआ था। यही कारण है कि दतिया की जीत को केवल एक उपचुनाव के परिणाम के रूप में देखने के बजाय उस नेतृत्व प्रयोग की शुरुआती राजनीतिक परीक्षा के तौर पर भी पढ़ा जाना चाहिए।
कमलनाथ के बीजेपी में जाने की अटकलों ने भी खड़े किए थे सवाल
फरवरी 2024 में कमलनाथ और उनके बेटे नकुलनाथ के बीजेपी में जाने की अटकलें राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी खबर बनी थीं। दोनों दिल्ली पहुंचे थे और कई दिनों तक राजनीतिक हलचल रही, हालांकि अंततः कमलनाथ बीजेपी में शामिल नहीं हुए। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि उनका बीजेपी में जाना तय हो चुका था; लेकिन उन अटकलों ने कांग्रेस के भीतर पुराने नेतृत्व की प्रतिबद्धता और नई पीढ़ी को आगे बढ़ाने की जरूरत पर बहस जरूर तेज की। कांग्रेस ने नेतृत्व परिवर्तन का अपना फैसला वापस नहीं लिया और जीतू पटवारी प्रदेश अध्यक्ष बने रहे।
दतिया के आंकड़े बताते हैं कि मुकाबला कितना महत्वपूर्ण था
3 अगस्त 2026 को आए दतिया उपचुनाव के नतीजे में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया। घनश्याम सिंह को 66,757 और आशुतोष तिवारी को 60,741 वोट मिले। आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के दामोदर यादव मंडल ने 22,527 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहते हुए मुकाबले के सामाजिक और राजनीतिक गणित को और दिलचस्प बनाया। यह भी याद रखना चाहिए कि दतिया सीट 2023 में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने जीती थी। इसलिए तकनीकी रूप से कांग्रेस ने बीजेपी से सीट छीनी नहीं, बल्कि अपनी सीट बचाई। मगर सत्तारूढ़ बीजेपी की पूरी चुनावी ताकत के सामने सीट बचाना भी राजनीतिक रूप से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
दतिया में कई फैक्टर थे—लेकिन प्रदेश अध्यक्ष का वहीं जम जाना भी बड़ा फैक्टर था
किसी चुनावी जीत को केवल एक नेता की उपलब्धि बता देना राजनीतिक विश्लेषण नहीं होगा। दतिया में घनश्याम सिंह की अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन थी। बीजेपी में टिकट को लेकर असंतोष था। पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उतारने के फैसले के बाद पार्टी के भीतर विरोध सामने आया। आजाद समाज पार्टी के 22 हजार से ज्यादा वोटों ने भी समीकरण प्रभावित किए। जातीय, स्थानीय और उम्मीदवार आधारित फैक्टर अपनी जगह थे। मगर इन सबके बीच एक तथ्य राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है—प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने चुनाव को स्थानीय नेताओं के भरोसे छोड़कर भोपाल लौटना नहीं चुना। जीतू पटवारी ने दतिया में लगातार कैंप किया, गांवों और बूथों तक गए और संगठन की निगरानी अपने स्तर पर की। मतदान के दौरान बाहरी प्रचारकों को निर्वाचन क्षेत्र छोड़ने संबंधी नियम लागू होने के बाद भी कांग्रेस खेमे के अनुसार उन्होंने आसपास रहकर संगठन से संपर्क बनाए रखा। यह शैली बताती है कि उन्होंने दतिया को सामान्य उपचुनाव नहीं, अपनी संगठनात्मक परीक्षा माना था।
साइकिल यात्रा की थकान से सीधे दतिया की गलियों तक
पटवारी समर्थकों और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अनुसार, करीब 500 किलोमीटर की साइकिल यात्रा के बाद उन्हें पैरों में तकलीफ थी और आराम की सलाह मिली थी, लेकिन वे दतिया अभियान में उतर गए। चुनाव के दौरान 50 किलोमीटर से अधिक पैदल चलने, सुबह जल्दी ट्रेन पकड़ने, देर रात तक बूथ और सेक्टर की बैठकें करने तथा दूरदराज की बस्तियों तक पहुंचने के विवरण कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने साझा किए हैं। इन विशिष्ट आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, लेकिन उनका व्यापक और लगातार जमीनी अभियान सार्वजनिक रूप से दिखाई दिया। राजनीति में इसका महत्व इसलिए है क्योंकि विपक्षी प्रदेश अध्यक्ष के पास सरकार के संसाधन नहीं होते। उसका सबसे बड़ा संसाधन कार्यकर्ता होता है और कार्यकर्ता तभी सक्रिय होता है जब उसे अपना नेता मैदान में दिखाई देता है।
मोहन यादव और जीतू पटवारी—दिसंबर 2023 से शुरू हुई दो समानांतर यात्राएं
इस परिणाम का एक दिलचस्प राजनीतिक संदर्भ यह भी है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी लगभग एक ही राजनीतिक मोड़ पर अपनी मौजूदा भूमिकाओं में आए। दिसंबर 2023 में बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया और लगभग उसी समय कांग्रेस ने कमलनाथ की जगह जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया। दोनों अलग-अलग दलों की नई नेतृत्व व्यवस्था के चेहरे बने। इसलिए इसके बाद हुए उपचुनावों को दोनों के संगठनात्मक प्रदर्शन के छोटे-छोटे टेस्ट की तरह भी देखा जा सकता है।
बुधनी बीजेपी ने बचाई, लेकिन विजयपुर और दतिया कांग्रेस के खाते में
मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए महत्वपूर्ण विधानसभा उपचुनावों की तस्वीर दिलचस्प है। शिवराज सिंह चौहान के लोकसभा जाने के कारण खाली हुई बुधनी सीट बीजेपी ने नवंबर 2024 में बचा ली। लेकिन उसी दौर में विजयपुर में कांग्रेस के मुकेश मल्होत्रा ने बीजेपी उम्मीदवार और तत्कालीन मंत्री रामनिवास रावत को हरा दिया था। अब दतिया में भी कांग्रेस ने बीजेपी को पराजित कर अपनी सीट बरकरार रखी है। इस तरह इन तीन चर्चित मुकाबलों में बीजेपी बुधनी बचाने में सफल रही, जबकि विजयपुर और दतिया कांग्रेस के पक्ष में गए। यह अपने आप में 2028 का फैसला नहीं है, लेकिन कांग्रेस के लिए यह बताने लायक राजनीतिक सामग्री जरूर है कि बीजेपी को उसके मजबूत मध्य प्रदेश में हराया जा सकता है।
मोहन यादव बनाम जीतू पटवारी कहना आकर्षक है, लेकिन तस्वीर उससे बड़ी है
दतिया के बाद इसे सीधे ‘मोहन यादव हारे, जीतू पटवारी जीते’ कहना राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है, लेकिन वास्तविकता थोड़ी अधिक जटिल है। मुख्यमंत्री या प्रदेश अध्यक्ष स्वयं उम्मीदवार नहीं थे। मतदाता घनश्याम सिंह और आशुतोष तिवारी सहित चुनाव मैदान में मौजूद उम्मीदवारों के बीच फैसला कर रहे थे। फिर भी प्रदेश नेतृत्व चुनावी परिणाम से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। सत्ता पक्ष मुख्यमंत्री के चेहरे, सरकार के काम और संगठन के बल पर वोट मांगता है तो विपक्ष भी अपने प्रदेश अध्यक्ष की रणनीति और संगठन क्षमता पर चुनाव लड़ता है। इस लिहाज से दतिया पटवारी के खाते में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सफलता और मोहन यादव के नेतृत्व वाली बीजेपी के लिए एक गंभीर चेतावनी जरूर है।
राहुल गांधी और के.सी. वेणुगोपाल के नेतृत्व मॉडल की भी परीक्षा
जीतू पटवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा महत्वपूर्ण था। राहुल गांधी और संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के दौर में कांग्रेस ने कई राज्यों में अपेक्षाकृत युवा चेहरों और संगठनात्मक रूप से सक्रिय नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। किसी नेतृत्व की अपनी पसंद होना अपने आप में समस्या नहीं है। असली सवाल यह है कि उस नेता को जिम्मेदारी देने के बाद क्या उसे संगठन चलाने की पर्याप्त स्वतंत्रता भी दी जाती है? मध्य प्रदेश का अनुभव फिलहाल यह संकेत देता है कि प्रदेश अध्यक्ष को अधिकार और राजनीतिक स्पेस मिले तो उसकी जवाबदेही भी स्पष्ट होती है—हार होगी तो सवाल उससे होगा और जीत होगी तो उसके नेतृत्व को उसका हिस्सा मिलेगा।
कांग्रेस के लिए दतिया का सबसे बड़ा सबक—प्रदेश अध्यक्ष केवल पद नहीं होना चाहिए
कांग्रेस की पुरानी समस्या कई राज्यों में यही रही है कि प्रदेश अध्यक्ष होता कोई है, मुख्यमंत्री पद का दावेदार कोई दूसरा, टिकट वितरण में प्रभाव किसी तीसरे का और केंद्रीय नेतृत्व के सामने वीटो किसी चौथे का चलता है। ऐसी व्यवस्था में चुनाव हारने के बाद जिम्मेदार व्यक्ति तलाशना मुश्किल हो जाता है। दतिया का छोटा-सा प्रयोग बड़ा सबक देता है—एक मजबूत प्रदेश नेतृत्व तय कीजिए, उसे टीम बनाने दीजिए, जवाबदेही तय कीजिए और फिर परिणाम मांगिए। हर राज्य में वही मॉडल हूबहू लागू नहीं हो सकता, मगर नेतृत्व की अस्पष्टता किसी भी संगठन को कमजोर करती है।
एक जीत सचमुच पर्सेप्शन बदल देती है
राजनीति में पर्सेप्शन का अपना महत्व है। एक दिन पहले तक जिस संगठन को कमजोर कहा जा रहा हो, एक चुनावी जीत उसके कार्यकर्ताओं की भाषा बदल देती है। दफ्तर में बैठा कार्यकर्ता सड़क पर निकलता है, स्थानीय नेता टिकट की उम्मीद में सक्रिय होते हैं और मतदाता भी पार्टी को नए नजरिए से देखने लगता है। जीत केवल विधानसभा में एक संख्या नहीं जोड़ती, वह कार्यकर्ता को यह विश्वास देती है कि सामने वाला अपराजेय नहीं है। दतिया ने कांग्रेस को फिलहाल यही मनोवैज्ञानिक पूंजी दी है।
लेकिन दतिया को ‘मॉडल’ बनाने के लिए आत्ममुग्धता नहीं, और मेहनत चाहिए
यहीं कांग्रेस को सावधान भी रहना होगा। एक उपचुनाव जीतकर मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की घोषणा कर देना वही गलती होगी जो राजनीतिक दल अक्सर उत्साह में करते हैं। दतिया में उम्मीदवार का प्रभाव था, बीजेपी का आंतरिक असंतोष था और स्थानीय परिस्थितियां थीं। अगली सीट पर परिस्थितियां बिल्कुल अलग हो सकती हैं। इसलिए दतिया का असली मॉडल जीत का आंकड़ा नहीं, चुनाव से पहले की तैयारी होना चाहिए—प्रदेश अध्यक्ष का क्षेत्र में जमना, बूथ स्तर की समीक्षा, कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क और स्थानीय नेतृत्व को महत्व देना।
आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस के लिए संदेश साफ है
आने वाले महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनावी मुकाबले कांग्रेस और उसके सहयोगियों की परीक्षा लेंगे। पार्टी यदि चुनाव घोषित होने का इंतजार करेगी और अंतिम दो महीनों में उम्मीदवार, गठबंधन और संगठन पर फैसला करेगी तो दतिया का संदेश बेकार चला जाएगा। लेकिन यदि अभी से मजबूत और पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध प्रदेश नेतृत्व तय किया जाए, उसे अधिकार दिया जाए, बूथ स्तर पर संगठन सक्रिय किया जाए और केंद्रीय नेता प्रदेश इकाइयों के काम में सहयोगी बनें, तो मुकाबला बदल सकता है। हर जगह दतिया जैसा परिणाम मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं; लेकिन बिना दतिया जैसी मेहनत के परिणाम की उम्मीद करना भी राजनीतिक भ्रम होगा।
इसलिए जीतू पटवारी होना आसान नहीं है
दतिया की जीत केवल जीतू पटवारी की नहीं है। सबसे पहले यह मतदाताओं का फैसला है। फिर घनश्याम सिंह की स्थानीय पकड़, कांग्रेस के हजारों कार्यकर्ताओं की मेहनत, बीजेपी के भीतर पैदा हुए असंतोष और स्थानीय सामाजिक समीकरणों का योगदान है। लेकिन इन सबको एक चुनावी मशीन में जोड़ने का काम संगठन और उसके नेतृत्व का होता है। और यही वह जगह है जहां जीतू पटवारी को उनका हिस्सा मिलना चाहिए।
2023 में जब उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस की कमान मिली थी, तब उनके हाथ में विजय का जुलूस नहीं बल्कि विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित संगठन था। उस संगठन को दोबारा यह भरोसा दिलाना कि बीजेपी को हराया जा सकता है, अपने आप में पहली राजनीतिक चुनौती थी। विजयपुर ने एक संकेत दिया था। दतिया ने उस संकेत को थोड़ा और मजबूत किया है।
अभी 2028 बहुत दूर है। रास्ता कठिन है और एक-दो उपचुनाव किसी प्रदेश का भविष्य तय नहीं करते। मगर राजनीति में बड़ी वापसी अक्सर किसी बहुत बड़ी घटना से नहीं, ऐसी छोटी जीतों से शुरू होती है जो कार्यकर्ता के भीतर हार का डर तोड़ देती हैं।
दतिया ने कांग्रेस को सीट से ज्यादा वही भरोसा दिया है।
और शायद इसीलिए आज यह वाक्य केवल प्रशंसा नहीं, कांग्रेस के दूसरे प्रदेश नेतृत्व के लिए एक राजनीतिक संदेश भी है—“जीतू पटवारी होना आसान नहीं है।”




