ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अगस्त 2026
लोकतंत्र की असली परीक्षा तब नहीं होती जब सत्ता की प्रशंसा हो रही हो, बल्कि तब होती है जब नागरिक सत्ता से कठिन सवाल पूछ रहे हों। इसी कसौटी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता अतुल लिमये द्वारा CJP के आंदोलन को कथित तौर पर “देशविरोधी” और “संविधान के खिलाफ” बताने वाला बयान गंभीर सवाल खड़ा करता है। किसी आंदोलन के तरीकों, भाषा या मांगों से असहमति हो सकती है; उसकी आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन विरोध करने वाले युवाओं को सीधे राष्ट्रविरोध के कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करता है। देश, सरकार और किसी राजनीतिक दल को एक मान लेना लोकतंत्र की बुनियादी समझ के विपरीत है।
CJP आंदोलन की पृष्ठभूमि में NEET पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था और छात्रों से जुड़े सवाल रहे हैं। आंदोलन के दौरान किसी व्यक्ति ने कानून तोड़ा हो, हिंसा की हो या आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया हो तो कानून उसके आचरण की जांच करे। लेकिन कुछ व्यक्तियों के कथित आचरण के आधार पर पूरे आंदोलन को “देशविरोधी” घोषित कर देना अलग बात है। सरकार का विरोध देश का विरोध नहीं होता। किसी प्रधानमंत्री की आलोचना राष्ट्र की आलोचना नहीं होती। और सड़क पर उतरकर जवाब मांगना संविधान का अपमान नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल का हिस्सा हो सकता है।
यही सवाल पप्पू यादव से जुड़े हालिया विवाद में भी दिखाई देता है। संसद परिसर में राम मंदिर से जुड़े कथित ‘चंदा चोरी’ विवाद को लेकर विपक्षी नेताओं ने नाट्य-व्यंग्य किया, जिसमें पप्पू यादव ने कथित भ्रष्ट पुजारी का किरदार निभाया। इसके बाद इस प्रदर्शन को लेकर तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई और राहुल गांधी, पप्पू यादव तथा अवधेश प्रसाद से जुड़े मामले में वाराणसी में कानूनी कार्रवाई की खबरें सामने आईं। अब पप्पू यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में हंगामे और धक्का-मुक्की के बाद सांसद ने अपनी हत्या की साजिश का आरोप लगाया है। उनके आरोप की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए; बिना जांच इसे किसी संगठन से जोड़ देना भी उतना ही अनुचित होगा।
लेकिन इन घटनाओं के बीच एक बड़ा वैचारिक सवाल जरूर उठता है—क्या राजनीतिक व्यंग्य, प्रदर्शन और असहमति का जवाब तर्क से दिया जाएगा या राष्ट्रवाद और धार्मिक भावनाओं के प्रमाणपत्र बांटकर? लोकतंत्र में किसी नाट्य प्रदर्शन को खराब, अशोभनीय या आहत करने वाला कहा जा सकता है। उसके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध भी किया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक विरोधी को डराने, उसकी आवाज दबाने या हिंसा का माहौल पैदा करने का अधिकार किसी को नहीं मिलता।
RSS के इतिहास को लेकर भी आलोचक लंबे समय से तिरंगे के प्रति उसके पुराने दृष्टिकोण पर सवाल उठाते रहे हैं। नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में नियमित रूप से राष्ट्रीय ध्वज न फहराए जाने का इतिहास राजनीतिक बहस का विषय रहा है; 2002 से वहां गणतंत्र दिवस पर तिरंगा नियमित रूप से फहराया जाने लगा। इसलिए आज किसी आंदोलन या असहमति को राष्ट्रभक्ति की कसौटी पर परखते समय इतिहास के इन अध्यायों पर भी ईमानदार चर्चा होनी चाहिए। इतिहास को न तो राजनीतिक हथियार बनाना चाहिए और न सुविधानुसार भूल जाना चाहिए।
सबसे बड़ी समस्या किसी व्यक्ति को “संघी” या “भाजपाई” होने के कारण मानसिक रूप से बीमार कहना नहीं हो सकती—ऐसा सामान्यीकरण स्वयं उसी असहिष्णुता को जन्म देगा जिसका विरोध किया जा रहा है। आलोचना व्यक्ति की पहचान की नहीं, उस राजनीतिक मानसिकता की होनी चाहिए जो अपने विरोधी को देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी या संविधान-विरोधी घोषित करके बहस समाप्त करना चाहती है। लोकतंत्र में विचार का जवाब विचार है, सवाल का जवाब तथ्य है और आंदोलन का जवाब संवाद है।
भारत का संविधान किसी एक दल, संगठन, विचारधारा या सरकार की जागीर नहीं है। वह उस नागरिक का भी है जो सरकार के समर्थन में खड़ा है और उसका भी जो जंतर-मंतर पर उसके खिलाफ नारा लगा रहा है। संविधान की ताकत ही यही है कि वह दोनों को जगह देता है—बशर्ते दोनों कानून और दूसरे नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करें।
राष्ट्रभक्ति का अर्थ सत्ता से सहमति नहीं है। कई बार सत्ता से सवाल पूछना भी राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का सबसे लोकतांत्रिक रूप होता है। जिस दिन हर असहमति को “देशविरोध” और हर प्रदर्शन को “षड्यंत्र” कहकर खारिज किया जाने लगेगा, उस दिन नुकसान किसी एक आंदोलन या विपक्षी दल का नहीं होगा—नुकसान उस लोकतांत्रिक भारत का होगा जिसकी रक्षा करने का दावा सत्ता और विपक्ष, दोनों करते हैं।




