अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 2 अगस्त 2026
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण और शुल्क वसूली को लेकर नई बहस छिड़ गई है। अमेरिका और इजरायल के साथ जारी संघर्ष के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से नेविगेशन, सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी सेवाओं के नाम पर शुल्क लेने की बात कही है। दूसरी ओर ईरान समर्थित हूती समूह बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले जहाजों के लिए भी टोल व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं।
मामला केवल ईरान या लाल सागर तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि क्या कोई देश अंतरराष्ट्रीय समुद्री जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से अपनी मर्जी से टोल वसूल सकता है?
होर्मुज पर क्यों टिकी दुनिया की नजर?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी को अरब सागर और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। युद्ध से पहले दुनिया के तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता था। इसलिए यहां किसी भी तरह की बाधा ऊर्जा आपूर्ति, तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर व्यापक असर डाल सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान ने उन जहाजों को निशाना बनाने की बात कही है जो उसकी अनुमति के बिना इस रास्ते से गुजरते हैं। इसी बीच ओमान ने कथित तौर पर एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जिसमें होर्मुज के प्रबंधन और कुछ सेवाओं के बदले स्वैच्छिक शुल्क की व्यवस्था की जा सकती है। अमेरिका का रुख है कि होर्मुज एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है और ईरान को टोल के जरिए उस पर नियंत्रण स्थापित नहीं करने दिया जा सकता।
समुद्री कानून क्या कहता है?
आधुनिक समुद्री व्यवस्था की बुनियाद United Nations Convention on the Law of the Sea यानी UNCLOS है। इसके तहत किसी देश का प्रादेशिक समुद्र सामान्यतः तट से 12 नॉटिकल मील तक माना जाता है।
लेकिन होर्मुज, बाब-अल-मंदेब, जिब्राल्टर और मलक्का जैसे संकरे रास्तों के मामले में एक विशेष व्यवस्था है, जिसे ‘Transit Passage’ कहा जाता है।
इसके तहत अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले जलडमरूमध्य से जहाजों और विमानों को लगातार और शीघ्र आवागमन का अधिकार मिलता है। तटीय देश सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और निर्धारित समुद्री मार्गों से जुड़े नियम लागू कर सकते हैं, लेकिन सामान्य रूप से केवल रास्ते से गुजरने के अधिकार के बदले शुल्क लगाने की गुंजाइश नहीं है। जहाज को दी गई किसी विशिष्ट सेवा के लिए शुल्क अलग मामला हो सकता है।
ईरान ने UNCLOS की पुष्टि नहीं की, फिर भी मामला इतना आसान नहीं
ईरान ने 1982 में UNCLOS पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन उसका अनुमोदन नहीं किया। अमेरिका भी इस संधि का पक्षकार नहीं है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय नौवहन से जुड़े इसके कई सिद्धांतों को व्यापक रूप से customary international law का हिस्सा माना जाता है।
इसी कारण होर्मुज में एकतरफा टोल लगाने का ईरानी प्रस्ताव कानूनी और कूटनीतिक विवाद का कारण बन सकता है।
हूतियों का ‘रेड सी टोल’ और भी विवादास्पद
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम है। हूती समूह यहां से गुजरने वाले जहाजों के लिए शुल्क व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं।
लेकिन यहां स्थिति ईरान से भी अलग है। हूती एक गैर-राज्य सशस्त्र समूह हैं और UNCLOS उन्हें अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर टोल लगाने का अधिकार नहीं देता।
मलक्का और जिब्राल्टर में नहीं लगता सामान्य ट्रांजिट टोल
स्ट्रेट ऑफ मलक्का का प्रबंधन इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर मिलकर करते हैं। यह हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर को जोड़ने वाली दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक धमनियों में से एक है। यहां जहाजों से सामान्य ट्रांजिट टोल नहीं लिया जाता।
इसी तरह स्पेन और मोरक्को के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर से भी जहाज बिना सामान्य ट्रांजिट शुल्क के गुजरते हैं।
तुर्की के जलडमरूमध्य की व्यवस्था अलग
हर जलडमरूमध्य पर एक जैसे नियम लागू नहीं होते। तुर्की के बोस्फोरस और डार्डानेल्स पर 1936 की Montreux Convention लागू होती है। इसके तहत तुर्की लाइटहाउस, बचाव, पायलटेज और कुछ अन्य सेवाओं के लिए शुल्क ले सकता है।
यानी यहां पैसा केवल रास्ता देने के लिए नहीं, बल्कि संधि के तहत निर्धारित सेवाओं से जुड़ा है।
स्वेज और पनामा नहर क्यों वसूल सकती हैं भारी टोल?
स्वेज और पनामा प्राकृतिक जलडमरूमध्य नहीं, मानव निर्मित नहरें हैं। इसलिए इनकी कानूनी स्थिति होर्मुज या मलक्का से अलग है।
स्वेज नहर का संचालन मिस्र की Suez Canal Authority करती है और जहाज के प्रकार तथा माल के आधार पर शुल्क निर्धारित किया जाता है। पनामा नहर में भी जहाजों को पारगमन के लिए भारी शुल्क देना पड़ता है।
होर्मुज की लड़ाई सिर्फ टोल की नहीं
होर्मुज विवाद के केंद्र में असल सवाल समुद्री रास्ते पर नियंत्रण का है। यदि इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर एकतरफा शुल्क या अनुमति की व्यवस्था स्थापित होती है, तो इसका प्रभाव केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा। तेल और गैस की आपूर्ति से लेकर जहाजरानी की लागत और वैश्विक महंगाई तक इसके असर दिखाई दे सकते हैं।
इसीलिए होर्मुज और बाब-अल-मंदेब पर जारी खींचतान अब युद्ध के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार की स्वतंत्रता की परीक्षा भी बनती जा रही है।




