ओपिनियन | सोना मोहपात्रा, बॉलीवुड सिंगर | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 25 जुलाई 2026
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हमारी रचनात्मक दुनिया को तेजी से बदल रहा है। संगीत, सिनेमा और कला के लगभग हर क्षेत्र में इसकी मौजूदगी बढ़ रही है। लेकिन इस बदलाव के साथ एक बड़ा सवाल भी हमारे सामने खड़ा है—क्या तकनीक कलाकार की मदद करेगी, या धीरे-धीरे उसकी जगह ले लेगी?
हाल ही में मुझे एक ओड़िया भजन गाने का प्रस्ताव मिला। पहले लगा कि यह नए कलाकारों के साथ जुड़ने और अपनी संस्कृति से जुड़े एक अच्छे प्रयास का हिस्सा बनने का अवसर है। लेकिन जब मैंने इसके बारे में थोड़ा और जाना, तो पता चला कि यह कोई वास्तविक संगीत बैंड नहीं, बल्कि AI से तैयार किया गया एक वर्चुअल बैंड है। उसके सदस्य इंसान नहीं, बल्कि डिजिटल अवतार हैं। यह जानने के बाद मैंने उस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
मेरा यह फैसला तकनीक के खिलाफ नहीं था। मैंने अपने गीत ‘घने भद्रा’ के वीडियो में भी AI का उपयोग किया है। लेकिन वहां AI सिर्फ दृश्य प्रभावों को बेहतर बनाने का माध्यम था। गीत मेरी आवाज में था, संगीत इंसानों ने बनाया था और पूरी रचना की आत्मा भी मानवीय थी। AI ने केवल कल्पना को विस्तार दिया, कलाकार की जगह नहीं ली।
यहीं सबसे बड़ा फर्क है। जब कोई कलाकार अपनी रचना को बेहतर बनाने के लिए तकनीक का इस्तेमाल करता है, तब AI उसका सहयोगी बनता है। लेकिन जब कोई कंपनी AI के जरिए पूरी तरह कृत्रिम कलाकार तैयार करके उसे असली कलाकार की तरह पेश करती है, तब सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि कला, नैतिकता और रचनात्मक भविष्य का बन जाता है।
आज स्वतंत्र कलाकार पहले से ही कठिन दौर से गुजर रहे हैं। गीत लिखने से लेकर रिकॉर्डिंग, संगीत, वीडियो, प्रचार और वितरण तक हर कदम पर उन्हें अपनी जेब से खर्च करना पड़ता है। ऐसे में यदि AI उनके सपनों को कम लागत में साकार करने का साधन बनता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन अगर यही तकनीक कलाकारों की पहचान, मेहनत और अवसर छीनने लगे, तो यह चिंता का विषय है।
एक और गंभीर सवाल है कि AI जिन लाखों गीतों, धुनों और रचनाओं से सीखता है, क्या उन कलाकारों से अनुमति ली गई? क्या उन्हें श्रेय मिला? क्या उन्हें उनके काम का उचित पारिश्रमिक मिला? दुनिया भर में इस पर बहस जारी है। तकनीक का विकास जरूरी है, लेकिन रचनाकारों के अधिकारों की अनदेखी करके नहीं।
मेरा मानना है कि हमें तकनीक से डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसके इस्तेमाल की सीमाएं जरूर तय करनी होंगी। कलाकारों को यह समझना होगा कि वे अपनी आवाज, पहचान और साख किस उद्देश्य के लिए दे रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि आज हम जिस तकनीक को आगे बढ़ा रहे हैं, वही कल हमें ही अप्रासंगिक बना दे।
AI मानव रचनात्मकता का विस्तार कर सकता है, लेकिन वह इंसानी संवेदना, अनुभव, संघर्ष और आत्मा की जगह कभी नहीं ले सकता। कला की असली ताकत किसी एल्गोरिद्म में नहीं, बल्कि उस इंसान में होती है जो उसे जीता है, महसूस करता है और दुनिया तक पहुंचाता है। इसलिए मेरी नजर में AI का सही स्थान कलाकार के साथ है, कलाकार की जगह नहीं।




