अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/नई दिल्ली | 17 जुलाई 2026
रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका ने एक बार फिर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। अमेरिकी सीनेट में पेश नए प्रतिबंध विधेयक में भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान जैसे देशों के निर्यात पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। हालांकि यह अभी केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी मिलनी बाकी है।
यह नया प्रस्ताव पहले के मुकाबले अपेक्षाकृत नरम माना जा रहा है। जनवरी 2026 में इसी विधेयक में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान रखा गया था। अब इसे घटाकर अधिकतम 100 प्रतिशत करने का प्रस्ताव दिया गया है।
वॉशिंगटन में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि रूस के सबसे बड़े तेल खरीदार देशों को इस विधेयक के दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान का नाम लेते हुए कहा कि इन देशों पर टैरिफ लगाने का उद्देश्य रूस के ऊर्जा कारोबार पर दबाव बनाना है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम टैरिफ दर अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) तय करेगा। यदि किसी देश पर कम दर लागू की जाती है, तो उसके लिए भी अमेरिकी कांग्रेस को कारण बताना होगा।
भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
भारत के लिए यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह चीन के बाद रूस से कच्चा तेल खरीदने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया, जिससे ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखने और घरेलू महंगाई पर दबाव कम करने में मदद मिली।
अगस्त 2025 में अमेरिका ने पहली बार भारत पर रूस से तेल खरीदने को लेकर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया था। इसके बाद भारत पर कुल अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता भी प्रभावित हुई थी।
हालांकि, फरवरी 2026 में अमेरिका-ईरान संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई। उस समय अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर अस्थायी छूट दी, जिसके बाद भारत ने फिर से बड़े पैमाने पर रूस से तेल खरीदना शुरू कर दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, जून 2026 में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात 34 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इसकी कुल कीमत लगभग 4.5 अरब यूरो रही, जो रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात राजस्व का लगभग 36 प्रतिशत थी।
यदि यह नया विधेयक पारित होकर लागू होता है, तो भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। इससे इंजीनियरिंग उत्पाद, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स और अन्य निर्यात क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है। साथ ही भारत और अमेरिका के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) की बातचीत भी प्रभावित हो सकती है।
फिलहाल भारत और अमेरिका व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे भारत पर लागू कुल टैरिफ को घटाकर 18 प्रतिशत तक लाने की उम्मीद है। वहीं वर्तमान में भारतीय वस्तुओं पर अमेरिका में 15 प्रतिशत का अस्थायी शुल्क लागू है, जिसकी अवधि 24 जुलाई को समाप्त होने वाली है।
ऐसे में अमेरिकी सीनेट का यह नया प्रस्ताव भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार नीति और अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों के लिए आने वाले समय में एक नई चुनौती बन सकता है। हालांकि अंतिम तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि यह विधेयक कांग्रेस से पारित होता है या नहीं, और यदि होता है तो अमेरिका भारत सहित अन्य देशों पर किस दर से टैरिफ लागू करता है।




