अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | अंकारा | 16 जुलाई 2026
मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख एवं चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की तुर्की यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच रणनीतिक और रक्षा सहयोग पर उच्चस्तरीय वार्ता हुई। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच पहले से मौजूद रक्षा सहयोग व्यवस्था में शामिल होने पर विचार कर रहा है। हालांकि, तीनों देशों की सरकारों ने अभी तक किसी औपचारिक त्रिपक्षीय सैन्य गठबंधन या तथाकथित “इस्लामिक नाटो” के गठन की आधिकारिक घोषणा नहीं की है।
रिपोर्टों के अनुसार, अंकारा में राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन और आसिम मुनीर के बीच हुई मुलाकात में क्षेत्रीय सुरक्षा, ईरान-इजरायल-अमेरिका संघर्ष, हूती हमलों, रक्षा उद्योग में सहयोग और सैन्य तकनीक के आदान – प्रदान जैसे विषयों पर चर्चा हुई। तुर्की लंबे समय से पाकिस्तान का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है। उसने पाकिस्तान को युद्धपोत, ड्रोन, मिसाइल प्रणालियां और अन्य सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए हैं तथा भविष्य में अपने स्वदेशी KAAN लड़ाकू विमान के निर्यात में भी पाकिस्तान को संभावित ग्राहक के रूप में देख रहा है।
दूसरी ओर, पाकिस्तान के लिए यह साझेदारी केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब का वित्तीय सहयोग बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच हुए रक्षा सहयोग समझौते के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तानी सैनिक और सैन्य विशेषज्ञ सऊदी अरब में तैनात किए गए। यह तैनाती ऐसे समय हुई जब ईरान समर्थित हूती समूहों के हमलों और क्षेत्रीय तनावों के कारण सऊदी अरब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में जुटा हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के साथ हालिया संघर्ष ने खाड़ी क्षेत्र के कई देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर किया है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की सुरक्षा गारंटी को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच क्षेत्रीय शक्तियां वैकल्पिक सुरक्षा व्यवस्थाओं की संभावनाएं तलाश रही हैं। इसी संदर्भ में पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब के बीच बढ़ता सैन्य सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कुछ रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भविष्य के संभावित क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे की दिशा में कदम मान रहे हैं।
कुछ मीडिया रिपोर्टों और विश्लेषणों में इस प्रस्तावित व्यवस्था को R-4 समूह या अनौपचारिक रूप से “इस्लामिक नाटो” कहा गया है, जिसमें भविष्य में मिस्र के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। प्रस्तावित ढांचे का उद्देश्य रक्षा समन्वय, संयुक्त सैन्य अभ्यास, खुफिया सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों पर साझा रणनीति विकसित करना बताया जा रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसे किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन के गठन की अभी तक स्वतंत्र पुष्टि या आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इस बढ़ते रक्षा सहयोग के पीछे केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक हित भी जुड़े हैं। तुर्की अपने रक्षा उद्योग के लिए नए बाजार तलाश रहा है, पाकिस्तान को आर्थिक और सैन्य सहयोग की आवश्यकता है, जबकि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा संरचना को अधिक बहुआयामी बनाना चाहता है। इन तीनों देशों के हित कई मामलों में एक-दूसरे से मेल खाते हैं।
भारत के दृष्टिकोण से भी इस घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है। दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक परिस्थितियों, भारत – यूएई – इजरायल के बढ़ते सहयोग तथा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के संदर्भ में इस प्रकार की संभावित सुरक्षा व्यवस्था भविष्य में महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है। हालांकि, जब तक संबंधित देशों की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं होती, तब तक इसे उभरते रक्षा सहयोग और रणनीतिक विमर्श के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित सैन्य गठबंधन के रूप में।




