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30 दिन जेल में रहे PM-CM तो कुर्सी जाएगी? संसदीय समिति ने दिया बड़ा सुझाव

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 11 जुलाई 2026

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को 30 दिन तक न्यायिक हिरासत में रहने पर पद से हटाने संबंधी प्रस्तावित संविधान (130वां संशोधन) विधेयक पर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। इस विधेयक की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी मसौदा रिपोर्ट में महत्वपूर्ण बदलावों की सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि विधेयक में प्रयुक्त “Removal” (पद से हटाना) शब्द की जगह “Suspension” (निलंबन) शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को केवल 30 दिन की न्यायिक हिरासत के आधार पर स्थायी रूप से पद से हटाना लोकतांत्रिक और संवैधानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा। हालांकि, यदि कोई जनप्रतिनिधि लंबे समय तक जेल में रहता है तो उसके लिए सरकार चलाना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता। ऐसे में निलंबन का विकल्प अधिक संतुलित और न्यायसंगत माना गया है, ताकि बाद में अदालत से राहत मिलने की स्थिति में संबंधित जनप्रतिनिधि के अधिकार पूरी तरह समाप्त न हों।

‘जेल से सरकार नहीं चल सकती’, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान भी जरूरी

समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि “Governance from Custody” यानी जेल से शासन चलाने जैसी स्थिति को रोकना है। समिति ने इस बात पर भी जोर दिया कि केवल गिरफ्तारी या न्यायिक हिरासत को ही पद छोड़ने का स्वतः आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि विधेयक के प्रावधानों और भाषा में संशोधन कर ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाए, जो संविधान की मूल भावना, प्राकृतिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हो। समिति का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के राजनीतिक अधिकारों पर स्थायी प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए यदि संबंधित जनप्रतिनिधि बाद में अदालत से बरी होता है या उसे राहत मिलती है, तो उसके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने वाले प्रावधान भी विधेयक में शामिल किए जाने चाहिए।

विपक्ष ने किया बहिष्कार, बताया ‘राजनीतिक हथियार’

इस विधेयक की समीक्षा के लिए भाजपा सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता में गठित संयुक्त संसदीय समिति में अधिकांश विपक्षी दलों ने हिस्सा ही नहीं लिया। विपक्ष का आरोप है कि यह विधेयक राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने और निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने का माध्यम बन सकता है। विपक्षी दलों ने इसे “दुर्भावनापूर्ण मंशा” से प्रेरित बताते हुए समिति की कार्यवाही का बहिष्कार किया। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि यदि कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहता है, तो शासन व्यवस्था में संवैधानिक और प्रशासनिक शून्य पैदा हो सकता है, जिसे दूर करने के लिए इस कानून की आवश्यकता है। अब संयुक्त संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद सरकार इन सुझावों को स्वीकार करती है या नहीं, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। यदि इन सिफारिशों के आधार पर विधेयक में संशोधन किया जाता है, तो यह देश की संवैधानिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और राजनीतिक जवाबदेही से जुड़े कानूनों में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

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