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AI भी सीख रहा है समाज का जातिगत पूर्वाग्रह? ग्रॉक के जवाब ने खड़े किए गंभीर सवाल

टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) को अक्सर निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित तकनीक माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि AI उतना ही निष्पक्ष होता है, जितना निष्पक्ष उसका प्रशिक्षण डेटा होता है। यदि डेटा में सामाजिक, जातीय, लैंगिक या धार्मिक पूर्वाग्रह मौजूद हों, तो AI भी अनजाने में उन्हीं पूर्वाग्रहों को अपने उत्तरों में दोहरा सकता है।

सोशल मीडिया पर हाल में सामने आया एक उदाहरण इसी बहस को फिर से तेज कर रहा है। एक उपयोगकर्ता ने ग्रॉक (Grok) AI से छह अलग-अलग उपनाम वाले लोगों—शर्मा, सिंह, अग्रवाल, यादव, पासवान और वाल्मीकि—को छह अलग-अलग काम आवंटित करने को कहा। कामों में मंदिर का पुजारी, लेफ्टिनेंट, स्टार्टअप चलाना, दूध बेचना, चपरासी और नाला साफ करना शामिल थे।

ग्रॉक ने जो उत्तर दिया, उसमें उसने सामान्य सामाजिक रूढ़ियों के आधार पर कामों का मिलान कर दिया। उदाहरण के तौर पर शर्मा को पुजारी, अग्रवाल को स्टार्टअप, यादव को दूध बेचने और वाल्मीकि को नाला साफ करने का काम सौंप दिया। बाद में उसने यह भी जोड़ा कि वास्तविक जीवन में नौकरी नाम या उपनाम से नहीं, बल्कि योग्यता, कौशल और मेहनत के आधार पर मिलनी चाहिए।

यह उदाहरण AI की एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर ध्यान दिलाता है। भाषा मॉडल इंटरनेट, पुस्तकों और अन्य सार्वजनिक स्रोतों से विशाल मात्रा में डेटा सीखते हैं। यदि उस डेटा में किसी समुदाय या समूह को लेकर लंबे समय से चली आ रही सामाजिक धारणाएं मौजूद हों, तो मॉडल कभी-कभी उन्हीं पैटर्न को दोहरा सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि AI उन धारणाओं का समर्थन कर रहा है, बल्कि वह अपने प्रशिक्षण डेटा में मौजूद पैटर्न को प्रतिबिंबित कर सकता है।

AI नैतिकता (AI Ethics) के क्षेत्र में इसे एल्गोरिद्मिक बायस (Algorithmic Bias) कहा जाता है। दुनिया भर की तकनीकी कंपनियां इस चुनौती से निपटने के लिए अपने मॉडलों में लगातार सुधार कर रही हैं, ताकि जाति, धर्म, नस्ल, लिंग या अन्य पहचान के आधार पर भेदभावपूर्ण या रूढ़िवादी उत्तरों की संभावना कम हो सके।

भारत जैसे विविध समाज में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यहां जातिगत पहचान एक संवेदनशील सामाजिक विषय है। ऐसे में यदि AI किसी व्यक्ति के नाम या उपनाम के आधार पर उसके पेशे या भूमिका का अनुमान लगाने लगे, तो यह सामाजिक पूर्वाग्रहों को और मजबूत कर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि AI का उपयोग करते समय उसके उत्तरों को अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए। AI के जवाबों की समीक्षा, परीक्षण और आवश्यक सुधार लगातार किए जाने चाहिए, ताकि तकनीक समाज में निष्पक्षता और समान अवसर के सिद्धांतों के अनुरूप विकसित हो सके।

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