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क्या ‘मुगलों ने मंदिर लूटे’ इतिहास है या कुप्रचार?

ओपिनियन | राकेश कायस्थ, वरिष्ठ पत्रकार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026

राम मंदिर चढ़ावा विवाद के बाद सोशल मीडिया पर एक वाक्य बहुत तेजी से फैलाया जा रहा है— “मुगलों ने भी मंदिरों को उतना नहीं लूटा, जितना इन लोगों ने लूटा।” पहली नज़र में यह एक राजनीतिक तंज लगता है, लेकिन ध्यान से देखें तो इसके भीतर एक और बड़ी कहानी छिपी हुई है। यह कहानी इतिहास, प्रचार और सामूहिक स्मृति की है।

ज़रा ठहरकर सोचिए। यदि आप इतिहास के सामान्य विद्यार्थी भी रहे हैं, तब भी शायद आपको तुरंत यह याद न आए कि मुगल शासकों द्वारा किन-किन मंदिरों की व्यवस्थित लूट का उल्लेख मिलता है। औरंगज़ेब के शासनकाल में काशी विश्वनाथ सहित कुछ मंदिरों को तोड़े जाने या उनके विरुद्ध कार्रवाई के उल्लेख इतिहास में मिलते हैं। यह इतिहास का विवादित लेकिन दर्ज अध्याय है। लेकिन मंदिरों को व्यवस्थित रूप से लूटने की कथा उतनी सरल नहीं है, जितनी आज सोशल मीडिया पर प्रस्तुत की जाती है। यही औरंगज़ेब कई मंदिरों और हिंदू धार्मिक संस्थानों को अनुदान देने के फरमान भी जारी करता है। इतिहास हमेशा एक रंग का नहीं होता।

मुगल काल को केवल तलवार और मंदिरों के चश्मे से देखना भी अधूरा इतिहास है। इसी दौर में तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई जैसे भक्ति कवियों ने अपनी अमर रचनाएं लिखीं। इसी काल में अब्दुल रहीम खानखाना ने कृष्ण भक्ति पर दोहे लिखे, रसखान ने श्रीकृष्ण को अपना आराध्य माना और मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना की। यदि पूरा दौर केवल धार्मिक दमन का ही होता, तो यह सांस्कृतिक समृद्धि कैसे संभव होती?

फिर सवाल उठता है कि सोशल मीडिया पर “मुगलों ने मंदिर लूटे” जैसी पंक्ति इतनी आसानी से क्यों स्वीकार कर ली जाती है? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि इसे वे लोग भी क्यों दोहरा रहे हैं जो स्वयं बीजेपी या आरएसएस की राजनीति के विरोधी होने का दावा करते हैं?

दरअसल, प्रचार की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वह किसी बात को बार-बार दोहराकर उसे लोकस्मृति का हिस्सा बना देता है। समय के साथ अफवाह इतिहास जैसी लगने लगती है। राजनीतिक प्रचार का उद्देश्य हमेशा तथ्य प्रस्तुत करना नहीं होता, बल्कि लोगों की स्मृति का निर्माण करना भी होता है। जो बात लगातार दोहराई जाती है, वह धीरे-धीरे सच जैसी प्रतीत होने लगती है।

एक और दिलचस्प बात है। भारत के लगभग एक हजार वर्षों के इस्लामी शासन को अक्सर एक ही शब्द—”मुगल काल”—में समेट दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि आम आदमी के लिए महमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, खिलजी, तुगलक, लोदी, बाबर, अकबर और औरंगज़ेब सभी “मुगल” बन जाते हैं, जबकि वे अलग-अलग वंशों, अलग-अलग समय और अलग-अलग नीतियों वाले शासक थे। इतिहास की यह जटिलता राजनीतिक नारों में गायब हो जाती है।

इतिहासकारों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि मुगल काल में भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंची थी। दूसरी ओर, औपनिवेशिक शासन के अंत तक यह हिस्सेदारी घटकर लगभग 3 प्रतिशत रह गई। इसका अर्थ यह नहीं कि मुगल शासन आदर्श था, बल्कि यह कि इतिहास को केवल एक ही चश्मे से नहीं पढ़ा जा सकता।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब भारत पर सबसे विनाशकारी हमले हुए, तब नादिरशाह और अहमद शाह अब्दाली जैसे आक्रमणकारियों ने व्यापक लूटपाट और नरसंहार किए। लेकिन सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श में उनके नाम अपेक्षाकृत कम सुनाई देते हैं। इसके विपरीत “मुगल” शब्द एक व्यापक राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। यह बदलाव संयोग है या सुनियोजित राजनीतिक रणनीति, इस पर बहस हो सकती है।

इतिहास का इस्तेमाल वर्तमान की राजनीति के लिए नया नहीं है। हर राजनीतिक विचारधारा अपने अनुकूल इतिहास चुनती है। लेकिन लोकतंत्र में चुनौती यह है कि इतिहास को शोध और प्रमाणों से समझा जाए, न कि केवल नारों और सोशल मीडिया पोस्ट से।

तुलसीदास की एक प्रसिद्ध पंक्ति आज भी सोचने पर मजबूर करती है—

“माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबो को एकु न दैबो को दोऊ।”

इस पंक्ति की व्याख्याएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इतिहास के अनेक आयाम होते हैं। उसे केवल नफ़रत या महिमामंडन के लिए इस्तेमाल करना, दोनों ही इतिहास के साथ न्याय नहीं करते।

आज जरूरत इस बात की है कि इतिहास को राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि अध्ययन का विषय बनाया जाए। क्योंकि जब इतिहास की जगह प्रचार ले लेता है, तब समाज केवल अतीत नहीं खोता, वह वर्तमान को भी गलत समझने लगता है।

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