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चंपत गए, बागड़ा आए… क्या राम मंदिर ट्रस्ट में सिर्फ चेहरे बदले हैं?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | अयोध्या | 7 जुलाई 2026

राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए यहां चढ़ाया गया एक-एक रुपया केवल दान नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक है। ऐसे में जब चढ़ावे में कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आए, तो देश को उम्मीद थी कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट पूरे मामले में पारदर्शिता दिखाएगा, दोष तय करेगा और श्रद्धालुओं का भरोसा बहाल करेगा। लेकिन ट्रस्ट की ताजा बैठक के बाद ऐसा लगता है कि सवालों के जवाब देने के बजाय केवल चेहरे बदल दिए गए हैं। संघ का एक आदमी गया तो संघ का दूसरा आदमी आ गया। आश्चर्य की बात यह है कि चोरी के आरोप में एक आदमी गया तो चोरी के आरोप में निकाला गया दूसरा आदमी गद्दी पर बैठा दिया गया।

बैठक में ट्रस्ट ने महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। इसके साथ ही उनके कार्यकाल की खुलकर सराहना भी की गई। यहीं सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है। यदि सब कुछ ठीक था तो इस्तीफा क्यों लिया गया? और यदि प्रशासनिक स्तर पर गंभीर चूक हुई थी तो उसी कार्यकाल की प्रशंसा किस आधार पर की गई? जवाबदेही और सम्मान एक साथ कैसे चल सकते हैं?

ट्रस्ट ने दावा किया कि उसे अब तक 3,264 करोड़ रुपये का दान मिला, जिसमें से 2,370 करोड़ रुपये निर्माण और अन्य कार्यों पर खर्च हुए तथा शेष राशि बैंक खातों में सुरक्षित है। ट्रस्ट ने यह भी कहा कि जिन बहुमूल्य वस्तुओं के चोरी होने की चर्चा थी, वे सुरक्षित हैं और चांदी की वस्तुओं को गलाकर छड़ें बना दी गई हैं। लेकिन करोड़ों श्रद्धालुओं का सवाल केवल आंकड़ों का नहीं है। सवाल यह है कि हर रुपये का स्वतंत्र ऑडिट, विस्तृत हिसाब और सार्वजनिक जवाबदेही कब सामने आएगी?

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा खुलासा ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी के सार्वजनिक पत्र ने किया। उन्होंने लिखा कि वे न बैंक खातों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे, न उनके पास चेकबुक थी, न चढ़ावे की गिनती से उनका कोई संबंध था और न ही चढ़ावा गिनने की मानक प्रक्रिया (SOP) बनाने में उनकी कोई भूमिका थी। उन्होंने यहां तक कहा कि संबंधित SOP उन्हें पहली बार पिछले महीने दिखाई गई।

यदि ट्रस्ट का कोषाध्यक्ष ही वित्तीय व्यवस्था से लगभग पूरी तरह बाहर था, तो फिर पूरी व्यवस्था का संचालन कौन कर रहा था? करोड़ों रुपये के दान, बैंकिंग व्यवस्था और चढ़ावे की गिनती का वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में था? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है और यही इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पक्ष है।

अगर ट्रस्ट का दावा है कि कोई चोरी नहीं हुई, तो फिर कर्मचारियों की गिरफ्तारी, बरामदगी और चल रही जांच का क्या मतलब है? यदि सब कुछ सामान्य था तो चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे क्यों लिए गए? यदि वे पूरी तरह निर्दोष थे तो उन्हें पद पर बनाए रखा जाना चाहिए था। और यदि गंभीर प्रशासनिक चूक हुई है तो केवल इस्तीफा पर्याप्त नहीं, जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

इसी बीच ट्रस्ट ने चंपत राय की जगह बजरंग लाल बागड़ा को नया महासचिव नियुक्त कर दिया। यहीं से विवाद का दूसरा अध्याय शुरू होता है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद कीर्ति आज़ाद ने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि बागड़ा को नाल्को (NALCO) के सीएमडी पद से दो कथित घोटालों के आरोपों के बाद हटाया गया था और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने उन्हें क्लीन चिट नहीं दी थी। सार्वजनिक रिकॉर्ड में भी उनके कार्यकाल के दौरान वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोपों का उल्लेख मिलता रहा है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब ट्रस्ट पहले से पारदर्शिता के संकट से जूझ रहा है, तब विवादों से जुड़े रहे व्यक्ति को सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारी क्यों सौंपी गई?

यह लेख किसी व्यक्ति को न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले दोषी घोषित नहीं करता। लेकिन सार्वजनिक जीवन में नैतिक जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी कानूनी जवाबदेही। जिस संस्था पर करोड़ों लोगों की आस्था टिकी हो, वहां नियुक्तियां भी ऐसी होनी चाहिए जिन पर किसी प्रकार का संदेह न हो।

ट्रस्ट की बैठक के बाद भी कई बुनियादी सवाल जस के तस हैं। यदि चोरी नहीं हुई तो कर्मचारियों से कथित बरामदगी क्यों हुई? यदि सब कुछ व्यवस्थित था तो महासचिव और ट्रस्टी के इस्तीफे क्यों स्वीकार किए गए? यदि कोषाध्यक्ष के पास कोई वास्तविक वित्तीय अधिकार नहीं था तो करोड़ों रुपये के दान का संचालन किसके निर्देश पर होता रहा?

राम मंदिर किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इसकी वित्तीय व्यवस्था पर उठने वाला हर सवाल पूरे समाज का सवाल बन जाता है। ट्रस्ट को चाहिए कि वह स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट कराए, दान और खर्च का पूरा सार्वजनिक लेखा-जोखा जारी करे तथा हर आरोप की निष्पक्ष और विश्वसनीय जांच सुनिश्चित करे।

चेहरे बदल देने से विश्वास वापस नहीं आता। विश्वास तब लौटता है जब हर सवाल का जवाब तथ्यों से दिया जाए, हर जिम्मेदारी तय हो और हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो। राम के नाम पर आए दान का सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि उसके एक-एक रुपये का हिसाब भी उसी ईमानदारी और पारदर्शिता से देश के सामने रखा जाए, जिस श्रद्धा से करोड़ों रामभक्तों ने उसे अर्पित किया।

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