पर्यावरण/ राष्ट्रीय/ छत्तीसगढ़ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/रायपुर | 7 जुलाई 2026
केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़ के संवेदनशील हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोल ब्लॉक को पर्यावरणीय मंजूरी दे दी है। इस फैसले के बाद परियोजना से प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख टन कोयले के उत्पादन का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, इस मंजूरी के साथ ही पर्यावरण, जैव विविधता और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर नया विवाद भी खड़ा हो गया है।
यह परियोजना छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में लगभग 1,760 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। इस कोल ब्लॉक का आवंटन 2015 में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) को किया गया था। परियोजना का खनन कार्य अडानी समूह द्वारा संचालित किया जाएगा और यहां से निकला कोयला राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को भेजा जाएगा।
सबसे बड़ी चिंता इस परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर जताई जा रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस परियोजना के लिए लगभग 1,742 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग होगा और इसके तहत करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है। हसदेव अरण्य को देश के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यह इलाका हाथियों के प्राकृतिक आवास, समृद्ध जैव विविधता और घने जंगलों के लिए जाना जाता है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई से केवल जंगल ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक असर पड़ सकता है। उनका मानना है कि हाथियों सहित कई वन्यजीवों के आवागमन के रास्ते प्रभावित होंगे और जैव विविधता को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।
दूसरी ओर, सरकार और परियोजना से जुड़े पक्षों का तर्क है कि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले का उत्पादन अभी भी आवश्यक है। उनका कहना है कि परियोजना के तहत सभी वैधानिक पर्यावरणीय प्रक्रियाओं का पालन किया गया है और प्रभावित गांवों के लोगों के पुनर्वास तथा मुआवजे की व्यवस्था भी की जाएगी।
हालांकि, स्थानीय आदिवासी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि हसदेव अरण्य केवल जंगल नहीं, बल्कि हजारों लोगों की आजीविका, संस्कृति और जीवन का आधार है। उनका आरोप है कि बड़े पैमाने पर खनन से स्थानीय समुदायों का विस्थापन होगा और प्राकृतिक संसाधनों पर उनका पारंपरिक अधिकार प्रभावित होगा।
विपक्षी दलों और कई पर्यावरण संगठनों ने भी केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण की वैश्विक चुनौतियों के बीच इतने बड़े वन क्षेत्र में खनन की अनुमति देना दीर्घकालिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता है।
फिलहाल पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद परियोजना आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन हसदेव अरण्य में प्रस्तावित खनन को लेकर राजनीतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि परियोजना के दौरान पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों के लिए तय शर्तों का पालन किस तरह किया जाता है।



