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दिग्विजय की अयोध्या यात्रा: क्या फिर बदलेंगे मध्य प्रदेश की राजनीति के समीकरण?

ओपिनियन/ मध्य प्रदेश | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026

राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि कोई नेता तब तक खत्म नहीं होता, जब तक वह खुद हार नहीं मान ले। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह एक बार फिर यही संदेश देते दिखाई दे रहे हैं।

राज्यसभा नहीं जाने के फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि दिग्विजय सिंह अब सक्रिय राजनीति के हाशिये पर चले जाएंगे। कांग्रेस के भीतर भी उनके प्रभाव को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन इसी बीच उन्होंने उज्जैन के महाकाल मंदिर से अयोध्या के श्रीराम मंदिर तक पदयात्रा की घोषणा कर राजनीतिक बहस का केंद्र फिर अपने नाम कर लिया।

दिग्विजय सिंह का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वे केवल बयान देने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि लंबी राजनीतिक रणनीति के साथ कदम बढ़ाते हैं। 2017 की नर्मदा परिक्रमा यात्रा को भी शुरू में कई लोगों ने महज धार्मिक यात्रा माना था। लेकिन उसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सरकार बनाई। इसलिए उनकी नई यात्रा को भी केवल धार्मिक कार्यक्रम मानना जल्दबाजी होगी।

इस बार फर्क सिर्फ इतना है कि यात्रा का दायरा कहीं बड़ा है। उज्जैन से शुरू होकर यह यात्रा अयोध्या पहुंचेगी और रास्ते में कई राज्यों से गुजरेगी। सबसे अहम बात यह है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह यात्रा वहां पहुंचेगी। ऐसे में इसके राजनीतिक संदेश और प्रभाव पर नजरें टिकी रहेंगी।

दिग्विजय सिंह लंबे समय से बीजेपी की हिंदुत्व राजनीति के सबसे मुखर आलोचकों में रहे हैं। ऐसे नेता का महाकाल से राम मंदिर तक पैदल जाना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। इससे कांग्रेस यह दिखाने की कोशिश भी कर सकती है कि आस्था और धर्म पर किसी एक दल का एकाधिकार नहीं है।

यात्रा से कांग्रेस को कितना राजनीतिक लाभ मिलेगा, यह भविष्य बताएगा। लेकिन इतना तय है कि दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर खुद को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है। जो लोग उनकी सक्रिय राजनीति के खत्म होने की बात कर रहे थे, उन्हें उन्होंने नया राजनीतिक एजेंडा देकर चौंका दिया है।

दिग्विजय सिंह को अक्सर भारतीय राजनीति का रणनीतिक खिलाड़ी कहा जाता है। उनकी राजनीति में समय, प्रतीक और संदेश तीनों का विशेष महत्व रहा है। यही कारण है कि उनकी हर बड़ी यात्रा को केवल धार्मिक या सामाजिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जाता है।

अब देखना यह होगा कि यह यात्रा केवल प्रतीक बनकर रह जाती है या 2017 की नर्मदा यात्रा की तरह फिर किसी बड़े राजनीतिक बदलाव की भूमिका तैयार करती है। इतना जरूर है कि दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उन्हें भारतीय राजनीति में यूं ही “रणनीतिक खिलाड़ी” नहीं कहा जाता।

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