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मुंबई-पुणे मिसिंग लिंक पर सवाल: ₹7,000 करोड़ की परियोजना पहली बारिश में क्यों लड़खड़ाई?

ओपिनियन/ महाराष्ट्र | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026

देश में बुनियादी ढांचे के विकास को केंद्र और राज्य सरकारें अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती हैं। एक्सप्रेसवे, सुरंगें, पुल और हाईवे विकास के नए प्रतीक बताए जाते हैं। लेकिन जब कोई बहुचर्चित परियोजना उद्घाटन के कुछ ही सप्ताह बाद पहली बारिश में प्रभावित हो जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। महाराष्ट्र सरकार की महत्वाकांक्षी मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे मिसिंग लिंक परियोजना भी अब ऐसे ही सवालों के केंद्र में है। लगभग 13.3 किलोमीटर लंबे इस लिंक पर करीब ₹7,000 करोड़ खर्च किए गए। सरकार का दावा था कि इससे मुंबई और पुणे के बीच की दूरी लगभग 6 किलोमीटर कम होगी और यात्रा का समय 20 से 30 मिनट तक घट जाएगा।

लेकिन उद्घाटन के लगभग नौ सप्ताह बाद ही भारी बारिश के दौरान परियोजना के एक हिस्से में क्षति की खबरें सामने आईं। यातायात प्रभावित हुआ और मरम्मत का काम शुरू करना पड़ा। ऐसे में जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस परियोजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए, क्या उसकी गुणवत्ता इतनी कमजोर थी कि पहली ही बरसात उसकी परीक्षा बन गई?

यह सच है कि पहाड़ी क्षेत्रों में बनने वाली सुरंगों, ढलानों और एक्सप्रेसवे पर मानसून के दौरान भूस्खलन और चट्टानें गिरने जैसी प्राकृतिक चुनौतियां रहती हैं। लेकिन यदि इंजीनियरिंग, डिजाइन और सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखा गया हो, तो ऐसी परियोजनाओं से अधिक मजबूती और टिकाऊपन की अपेक्षा की जाती है।

सरकार को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि मरम्मत का काम चल रहा है। जनता यह भी जानना चाहती है कि क्षति का वास्तविक कारण क्या था। क्या यह असाधारण प्राकृतिक परिस्थिति थी, इंजीनियरिंग की कमी थी, निर्माण की गुणवत्ता का सवाल था या रखरखाव में कहीं चूक हुई? इन सवालों का जवाब तकनीकी जांच और सार्वजनिक रिपोर्ट के जरिए सामने आना चाहिए।

देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है गुणवत्ता, जवाबदेही और पारदर्शिता। परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल उद्घाटन समारोहों और रिकॉर्ड लागत से नहीं, बल्कि उनकी मजबूती, उपयोगिता और लंबे समय तक टिकाऊ रहने की क्षमता से होता है।

विकास का असली पैमाना वही है जो वर्षों तक जनता की सेवा करे, न कि वह जो उद्घाटन के कुछ ही सप्ताह बाद सवालों के घेरे में आ जाए। यदि इस परियोजना में कहीं भी तकनीकी या प्रशासनिक चूक हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। क्योंकि सार्वजनिक धन से बनने वाली हर परियोजना का पहला अधिकार जनता का है, प्रचार का नहीं।

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