ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जुलाई 2026
राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस मंदिर से जुड़ा हर फैसला, हर दान और हर खर्च सामान्य सरकारी परियोजना की तरह नहीं देखा जा सकता। यहां दिया गया हर रुपया श्रद्धालुओं की मेहनत की कमाई और भगवान राम के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक है। ऐसे में यदि उसी व्यवस्था पर सवाल उठने लगें, तो सवाल केवल पैसों का नहीं, बल्कि विश्वास का बन जाता है।
राम मंदिर चढ़ावा मामले में अब जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वे केवल कथित चोरी तक सीमित नहीं रह गए हैं। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी के सार्वजनिक पत्र ने पूरी वित्तीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने साफ लिखा कि वे न बैंक खातों के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे, न उनके पास कोई चेकबुक थी, न उनका चढ़ावे की गिनती से कोई संबंध था और न ही चढ़ावा गिनने की SOP बनाने में उनकी कोई भूमिका थी। इतना ही नहीं, उन्होंने कहा कि उन्हें वह SOP पहली बार पिछले महीने दिखाई गई।
यदि ट्रस्ट का आधिकारिक कोषाध्यक्ष ही वित्तीय व्यवस्था से लगभग पूरी तरह बाहर था, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिर पूरा वित्तीय नियंत्रण किसके हाथ में था? आखिर निर्णय कौन ले रहा था? चढ़ावा कौन गिन रहा था? बैंकिंग व्यवस्था कौन चला रहा था? और वित्तीय प्रक्रिया की निगरानी किसके जिम्मे थी?
इसी बीच सोशल मीडिया और विभिन्न राजनीतिक हलकों में यह दावा भी तेजी से चर्चा में है कि सिर्फ चढ़ावे में ही नहीं, बल्कि ठेकों और निर्माण कार्यों में भी कथित तौर पर 40 प्रतिशत तक कमीशन वसूला जाता था। यह दावा अभी किसी जांच एजेंसी या अदालत द्वारा प्रमाणित नहीं हुआ है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। लेकिन जब ट्रस्ट का अपना कोषाध्यक्ष खुद वित्तीय प्रक्रिया से अलग होने की बात कह रहा हो, तब ऐसे आरोपों की निष्पक्ष जांच पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो जाती है।
साल 2021 में ‘राम मंदिर निधि समर्पण अभियान’ के दौरान केवल 44 दिनों में लगभग 2,100 करोड़ रुपये जुटाए गए थे। उसके पहले और बाद में मिले दान को जोड़कर सार्वजनिक अनुमानों में लगभग 3,500 करोड़ रुपये नकद दान की बात कही जाती रही है। इसके अलावा श्रद्धालुओं ने सोने-चांदी की ईंटें, बहुमूल्य आभूषण, हीरे-जवाहरात और अन्य कीमती वस्तुएं भी बड़ी संख्या में भगवान राम को अर्पित कीं। इन सबका वास्तविक और सार्वजनिक हिसाब आज भी देश जानना चाहता है।
मंदिर निर्माण पर लगभग 2,000 करोड़ रुपये खर्च होने की बात कही गई है। इतना बड़ा खर्च अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है। लेकिन जब पैसा करोड़ों श्रद्धालुओं के दान से आया हो, तब खर्च का विस्तृत, सार्वजनिक और आसानी से उपलब्ध ऑडिटेड विवरण भी सामने आना चाहिए। पारदर्शिता से किसी संस्था की प्रतिष्ठा घटती नहीं, बल्कि और मजबूत होती है।
भूमि खरीद को लेकर पहले भी विवाद सामने आए थे। अब चढ़ावे में कथित गड़बड़ी की जांच चल रही है। ट्रस्ट के दो प्रमुख पदाधिकारियों के इस्तीफे हो चुके हैं। ऐसे में केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि जांच चल रही है। अब जरूरत है कि पूरे वित्तीय ढांचे की स्वतंत्र फोरेंसिक ऑडिट हो, सभी दान, सभी संपत्तियों और सभी खर्चों का सार्वजनिक विवरण जारी किया जाए और यदि कहीं कोई दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ बिना किसी भेदभाव के कार्रवाई हो।
राम मंदिर किसी व्यक्ति, किसी संगठन या किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों रामभक्तों की आस्था का राष्ट्रीय प्रतीक है। इसलिए सबसे बड़ा दायित्व भी ट्रस्ट पर ही है कि वह हर सवाल का जवाब तथ्यों और दस्तावेजों के साथ दे। आखिर भगवान राम के नाम पर जुटाए गए हर रुपये का हिसाब भी उतना ही पवित्र होना चाहिए, जितनी श्रद्धा से वह दान किया गया था।
आस्था जवाबदेही से नहीं डरती। यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो सबसे पहले उसी पारदर्शिता को देश के सामने रखा जाना चाहिए। तभी रामभक्तों का विश्वास और मजबूत होगा और सभी संदेह स्वतः समाप्त हो जाएंगे।



