संस्कृति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | रायपुर | 5 जुलाई 2026
छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को पूरी दुनिया में पहचान दिलाने वाली महान लोक कलाकार और पंडवानी गायिका तीजन बाई का रविवार को निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं और लंबे समय से बीमार चल रही थीं। उन्होंने रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय लोक कला ने अपनी सबसे बुलंद और सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक को खो दिया।
तीजन बाई केवल एक लोक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे भारतीय लोक परंपरा की जीवित पहचान थीं। उन्होंने छत्तीसगढ़ की सदियों पुरानी पंडवानी कला को गांवों से निकालकर देश और दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंचाया। आज दुनिया के कई देशों में लोग पंडवानी को जानते हैं, तो उसमें सबसे बड़ा योगदान तीजन बाई का माना जाता है।
पंडवानी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक लोक कला है, जिसमें महाभारत की कहानियों को गीत, संगीत और अभिनय के माध्यम से सुनाया जाता है। तीजन बाई की आवाज़ में ऐसी ताकत थी कि वे अकेले मंच पर खड़े होकर महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देती थीं। उनके अभिनय, हाव-भाव और गायन ने लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध किया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक यह भी रही कि उन्होंने उस परंपरा को बदला, जिसमें पंडवानी गायन को केवल पुरुषों की कला माना जाता था। सामाजिक विरोध और कई कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने इस कला को अपनाया और अपनी मेहनत से साबित कर दिया कि प्रतिभा का कोई लिंग नहीं होता। धीरे-धीरे उनकी पहचान पूरे देश में बनी और फिर विदेशों तक पहुंच गई।
तीजन बाई ने कई दशकों तक भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने जहां भी मंच संभाला, वहां दर्शकों ने भारतीय लोक संस्कृति की गहराई और महाभारत की कथाओं को नए रूप में महसूस किया। उनकी प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन नहीं होती थीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपरा का परिचय भी होती थीं।
भारतीय लोक कला के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें देश के कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें पहले पद्मश्री, फिर पद्मभूषण और बाद में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। पद्म विभूषण भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई।
तीजन बाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और कला के दम पर वह मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना भी आसान नहीं थी। उन्होंने कभी अपनी लोक परंपरा को नहीं छोड़ा और हमेशा अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति से जुड़े रहीं। यही कारण है कि वे छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के लोगों के दिलों में खास जगह रखती थीं।
उनके निधन की खबर मिलते ही कला जगत, साहित्यकारों, लोक कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं में शोक की लहर दौड़ गई। अनेक लोगों ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए श्रद्धांजलि दी। उनके चाहने वालों का कहना है कि तीजन बाई जैसी कलाकार पीढ़ियों में एक बार जन्म लेती हैं।
तीजन बाई आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी प्रस्तुतियां और पंडवानी को नई ऊंचाई तक पहुंचाने का उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। उन्होंने साबित किया कि यदि किसी कलाकार में अपनी संस्कृति के प्रति समर्पण हो, तो वह अपनी मिट्टी की खुशबू को पूरी दुनिया तक पहुंचा सकता है। भारतीय लोक कला का यह स्वर्णिम अध्याय हमेशा उनके नाम से जुड़ा रहेगा।




