ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 जुलाई 2026
अयोध्या के राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े चंदे में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आए तीन सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान देशभर में संत समाज, रामभक्तों और आम नागरिकों ने सवाल उठाए, जांच की मांग की और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की आवाज बुलंद की। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), जो स्वयं को हिंदू समाज का वैचारिक मार्गदर्शक मानता है, अब जाकर इस मामले पर आधिकारिक रूप से बोला है।
संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा है कि दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए और “हिंदू समाज एकजुट रहे।” पहली बात स्वागत योग्य है—यदि किसी ने रामलला के नाम पर आए दान में गड़बड़ी की है तो उसे कानून के तहत कठोर दंड मिलना चाहिए। लेकिन दूसरी बात कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
आखिर “हिंदू समाज एकजुट रहे” का अर्थ क्या है?
क्या इस मामले में हिंदू समाज किसी दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा है? क्या यह विवाद हिंदू-मुस्लिम है? बिल्कुल नहीं।
राम मंदिर के चंदे में कथित चोरी का आरोप किसी मुस्लिम संगठन, किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति या किसी बाहरी ताकत पर नहीं है। आरोप मंदिर से जुड़े लोगों और व्यवस्था पर लगे हैं। ऐसे में हिंदुओं से एकजुट रहने की अपील किस संदर्भ में की जा रही है? क्या कहीं यह संदेश देने की कोशिश है कि इस मुद्दे पर सवाल उठाना हिंदू समाज के खिलाफ जाना है?
असलियत इसके बिल्कुल उलट है।
आज जो पीड़ा दिखाई दे रही है, वह हिंदू समाज के भीतर की पीड़ा है। यह आक्रोश रामभक्तों का है। यह दुख उन करोड़ों लोगों का है जिन्होंने अपनी श्रद्धा, विश्वास और आस्था के साथ मंदिर निर्माण में योगदान दिया। यह गुस्सा इसलिए है क्योंकि यदि दान में गड़बड़ी हुई है तो चोट सीधे भगवान राम के नाम पर बने विश्वास को पहुंची है।
इसलिए यह कहना कि “हिंदू समाज एकजुट रहे” मूल प्रश्न से ध्यान हटाने जैसा लगता है। आज जरूरत एकजुटता की नहीं, बल्कि जवाबदेही की है।
संघ यदि वास्तव में इस विषय पर गंभीर है तो उसे सबसे पहले यह कहना चाहिए था कि जांच पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध हो। दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के सामने जवाब देना होगा। यही संदेश समाज में विश्वास पैदा करता।
आज संत समाज में जो नाराजगी है, वह किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। उनका आक्रोश उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने यदि सचमुच श्रद्धालुओं के दान के साथ विश्वासघात किया है। संतों का सवाल साफ है—राम के नाम पर आए धन की पवित्रता कैसे भंग हुई? जवाब कौन देगा? जिम्मेदारी कौन लेगा?
आस्था की रक्षा केवल मंदिर बनाकर नहीं होती, बल्कि उस मंदिर की व्यवस्था को पारदर्शी और ईमानदार बनाकर होती है। यदि करोड़ों लोगों के दान में गड़बड़ी होती है और संस्थाएं चुप रहती हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान हिंदू समाज की आस्था का ही होता है।
संघ ने अपने बयान में “हिंदू विरोधी” और “राष्ट्र विरोधी” ताकतों की साजिश की भी बात कही। निश्चित रूप से यदि कोई इस घटना का इस्तेमाल समाज में नफरत फैलाने या सांप्रदायिक तनाव पैदा करने के लिए करता है, तो उसका विरोध होना चाहिए। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब वास्तविक सवालों को “साजिश” कहकर टालने की कोशिश की जाए। इससे न दोषियों को सजा मिलती है, न समाज का विश्वास लौटता है।
राम मंदिर किसी संगठन, ट्रस्ट या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस मामले में सबसे बड़ा धर्म यही है कि सच सामने आए, दोषियों को दंड मिले और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो।
आज देश को “हिंदू समाज एकजुट रहे” का संदेश नहीं चाहिए। देश को यह भरोसा चाहिए कि राम के नाम पर आए एक-एक रुपये का हिसाब होगा, दोषियों पर बिना किसी पक्षपात के कार्रवाई होगी और आस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी कीमत पर संरक्षण नहीं मिलेगा।
यही राम मंदिर की गरिमा की रक्षा होगी। यही करोड़ों रामभक्तों की भावना का सम्मान होगा। यही सच्चे अर्थों में धर्म और न्याय की विजय होगी।




