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क्या क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी राजनीतिक ढाल अब कांग्रेस बन रही है?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026

भारतीय राजनीति का एक बड़ा विरोधाभास आज साफ दिखाई देता है। जिन क्षेत्रीय दलों ने पिछले एक दशक में कांग्रेस को कमजोर कर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश की, वही दल अब अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी का विभाजन हो, बिहार में सहयोगियों पर दबाव, झारखंड, दिल्ली या अन्य राज्यों में बदलते राजनीतिक समीकरण—इन घटनाओं ने यह संदेश दिया है कि भारतीय जनता पार्टी अपने विस्तार की राजनीति में किसी भी क्षेत्रीय दल को स्थायी सहयोगी नहीं, बल्कि संभावित प्रतिद्वंद्वी के रूप में भी देख सकती है। यह विपक्ष का राजनीतिक आकलन है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस बहस को और तेज किया है।

लंबे समय तक कई क्षेत्रीय दलों की राजनीति का आधार कांग्रेस विरोध रहा। उनका मानना था कि कांग्रेस कमजोर होगी तो उनका जनाधार मजबूत होगा। लेकिन आज स्थिति बदलती दिख रही है। राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी का मुकाबला करने की क्षमता रखने वाली सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अभी भी कांग्रेस ही है। ऐसे में कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस लगातार कमजोर होती है, तो अंततः क्षेत्रीय दलों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

इसी संदर्भ में राहुल गांधी की राजनीति भी चर्चा का विषय बनी हुई है। समर्थकों का कहना है कि लगातार राजनीतिक हमलों, कानूनी चुनौतियों और चुनावी पराजयों के बावजूद राहुल गांधी पीछे हटते नहीं दिखे। वे लगातार सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं और सार्वजनिक मंचों से यह भी कहते रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनसे डरते हैं। यह एक राजनीतिक दावा है, लेकिन उनकी आक्रामक शैली ने विशेष रूप से युवाओं और छात्रों के एक वर्ग का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

राहुल गांधी के समर्थकों का तर्क है कि उनकी सबसे बड़ी ताकत चुनावी जीत से अधिक उनका राजनीतिक साहस और अपने घोषित विचारों पर कायम रहना है। वहीं आलोचकों का कहना है कि केवल वैचारिक संघर्ष पर्याप्त नहीं होता, संगठनात्मक मजबूती और चुनावी सफलता भी उतनी ही आवश्यक है। लोकतंत्र में इन दोनों दृष्टिकोणों की अपनी-अपनी जगह है।

आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कौन-सा दल किससे बड़ा है। असली प्रश्न यह है कि क्या विपक्षी दल आपसी प्रतिस्पर्धा से ऊपर उठकर अपने साझा राजनीतिक हितों को समझ पाएंगे? यदि क्षेत्रीय दल कांग्रेस को कमजोर करने को ही अपनी रणनीति बनाए रखते हैं, तो क्या वे भविष्य में स्वयं अधिक मजबूत रह पाएंगे? यही बहस अब भारतीय राजनीति के केंद्र में दिखाई दे रही है।

आने वाले विधानसभा चुनाव और उसके बाद के राष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रम इस सवाल का जवाब देंगे। लेकिन इतना तय है कि विपक्षी राजनीति का गणित बदल रहा है और क्षेत्रीय दलों के सामने यह फैसला पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि वे अपनी सबसे बड़ी चुनौती किसे मानते हैं—एक-दूसरे को या अपने साझा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को।

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