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मोदी से ट्रंप तक छपास रोग… हर जगह अपनी तस्वीर! लोकतंत्र या व्यक्तिपूजा की राजनीति?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026

लोकतंत्र में नेता जनता से बड़े नहीं होते, संस्थाएं होती हैं। संविधान, संसद, न्यायपालिका, राष्ट्रीय ध्वज और सरकारी दस्तावेज़ किसी व्यक्ति की नहीं, पूरे राष्ट्र की पहचान होते हैं। लेकिन जब निर्वाचित नेता सरकारी संस्थाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों पर अपनी व्यक्तिगत छाप छोड़ने लगें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह लोकतंत्र है या व्यक्तिपूजा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका की आज़ादी की 250वीं वर्षगांठ पर अपने चित्र वाला विशेष संस्करण पासपोर्ट पेश किया है। समर्थक इसे ऐतिहासिक स्मारक बता रहे हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि सरकारी दस्तावेज़ों को किसी जीवित राजनीतिक नेता की व्यक्तिगत छवि से जोड़ना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है। पासपोर्ट किसी राष्ट्रपति की उपलब्धि नहीं, बल्कि नागरिक और राष्ट्र के बीच कानूनी संबंध का दस्तावेज़ है। उस पर राष्ट्र की पहचान होनी चाहिए, किसी नेता की नहीं।

यह दृश्य भारत की भी एक पुरानी बहस की याद दिलाता है। कोविड-19 महामारी के दौरान जारी वैक्सीनेशन प्रमाणपत्रों पर टीका लगवाने वाले नागरिक की तस्वीर नहीं, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर छपी होती थी। उस समय विपक्ष, कई सार्वजनिक नीति विशेषज्ञों और नागरिकों ने प्रश्न उठाया था कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य दस्तावेज़ पर किसी राजनीतिक नेता की तस्वीर क्यों होनी चाहिए। सरकार ने इसे जन-जागरूकता अभियान का हिस्सा बताया, जबकि आलोचकों ने इसे सरकारी योजनाओं के राजनीतिक ब्रांडिंग का उदाहरण कहा।

यही बहस अब अमेरिका में भी खड़ी हो गई है। क्या सरकारी दस्तावेज़ किसी निर्वाचित नेता की लोकप्रियता बढ़ाने का माध्यम बनने चाहिए? क्या राष्ट्रीय प्रतीकों और प्रशासनिक दस्तावेज़ों को व्यक्तिगत छवि निर्माण से अलग नहीं रखा जाना चाहिए?

इतिहास बताता है कि जब किसी देश में सरकारी योजनाओं, प्रमाणपत्रों, विज्ञापनों, सार्वजनिक भवनों और राष्ट्रीय दस्तावेज़ों पर एक ही नेता का चेहरा लगातार दिखाई देने लगे, तो संस्थाएं धीरे-धीरे व्यक्ति के पीछे छिपने लगती हैं। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि नेता हर जगह दिखाई दे, बल्कि इस बात में है कि संस्थाएं किसी भी व्यक्ति से ऊपर बनी रहें।

ट्रंप का पासपोर्ट और भारत के वैक्सीनेशन प्रमाणपत्र—दोनों अलग-अलग देशों और परिस्थितियों के उदाहरण हैं, लेकिन दोनों ने एक समान बहस को जन्म दिया है। सवाल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें सरकारी पहचान और व्यक्तिगत प्रचार के बीच की दूरी कम होती जाती है।

किसी भी लोकतंत्र में नेता का सबसे बड़ा सम्मान उसकी तस्वीरें नहीं, बल्कि उसका काम होता है। सरकारी दस्तावेज़ नागरिकों के होते हैं, किसी राजनीतिक दल या नेता के नहीं। इसलिए चाहे वह अमेरिका हो या भारत, जब राष्ट्रीय दस्तावेज़ किसी जीवित राजनीतिक चेहरे के प्रचार का माध्यम बनने लगें, तो लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

आख़िरकार, मजबूत लोकतंत्र वह नहीं होता जहाँ हर सरकारी कागज़ पर शासक का चेहरा हो; मजबूत लोकतंत्र वह होता है जहाँ हर सरकारी दस्तावेज़ पर केवल राष्ट्र की पहचान हो और हर नागरिक को यह भरोसा हो कि संस्थाएं किसी व्यक्ति की नहीं, संविधान की हैं।

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