राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 27 जून 2026
केंद्र सरकार की एक कृषि सब्सिडी योजना को लेकर सामने आई एक जांच रिपोर्ट ने सरकारी योजनाओं में हितों के टकराव (Conflict of Interest) और पारदर्शिता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार “द इंडियन एक्सप्रेस” की जांच के अनुसार, केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को उनके ही मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण वाली योजना के तहत ₹99.60 लाख की सब्सिडी मिली है। वहीं, एक वरिष्ठ IAS अधिकारी नरेश पाल गंगवार के परिवार को पिछले पांच वर्षों में ₹1.16 करोड़ से अधिक की सब्सिडी मिलने का दावा किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक यह सब्सिडी मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत संचालित नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) की योजना के माध्यम से दी गई। इस योजना का उद्देश्य व्यावसायिक बागवानी और उच्च मूल्य वाली फसलों को बढ़ावा देना है। NHB कृषि मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।
जांच में कहा गया है कि अजमेर से सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती की परियोजना के लिए लगभग ₹99.60 लाख की सब्सिडी स्वीकृत हुई। रिपोर्ट के अनुसार, जिस बोर्ड के वे पदेन उपाध्यक्ष (Ex-officio Vice-President) हैं, उसी के अंतर्गत संचालित योजना से उन्हें लाभ मिला। हालांकि रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि अंतिम स्वीकृति उस समिति द्वारा दी जाती है, जिसमें मंत्री या बोर्ड के अध्यक्ष/उपाध्यक्ष सदस्य नहीं होते।
इसी जांच में यह भी सामने आया कि 1994 बैच के राजस्थान कैडर के IAS अधिकारी नरेश पाल गंगवार के परिवार—उनकी मां, पत्नी और बेटे—को राजस्थान में इसी योजना के तहत विभिन्न परियोजनाओं के लिए कुल ₹1.16 करोड़ से अधिक की सब्सिडी प्राप्त हुई। रिकॉर्ड के अनुसार ये परियोजनाएं मुख्यतः जयपुर जिले में व्यावसायिक बागवानी से जुड़ी थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, गंगवार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन्होंने सेवा नियमों के अनुसार आवश्यक संपत्ति और परियोजनाओं का विवरण घोषित किया है तथा नियमों का पालन किया गया है। वहीं, केंद्रीय मंत्री भागीरथ चौधरी को भी प्रश्न भेजे गए थे कि क्या इस मामले में हितों के टकराव की स्थिति बनती है।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और लाभार्थियों के चयन को लेकर लगातार बहस चल रही है। फिलहाल इस मामले में किसी जांच एजेंसी द्वारा अनियमितता या कानून के उल्लंघन की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन रिपोर्ट के सामने आने के बाद यह प्रश्न जरूर उठ रहे हैं कि क्या सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों को अपने ही मंत्रालय से जुड़ी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अतिरिक्त पारदर्शिता और नैतिक मानकों का पालन करना चाहिए।




