राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | मुंबई | 26 जून 2026
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (UBT) और बागी सांसदों के बीच टकराव अब सीधे जनता की अदालत तक पहुंचने जा रहा है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने घोषणा की है कि वे उन सभी संसदीय क्षेत्रों का दौरा करेंगे, जहां उनकी पार्टी के टिकट पर जीतने के बाद सांसदों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया। इन दौरों के दौरान वह मतदाताओं से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे और स्वीकार करेंगे कि उम्मीदवारों के चयन में उनसे बड़ी राजनीतिक भूल हुई।
उद्धव ठाकरे ने कहा, “मैं उन सभी इलाकों में जाकर वोटरों से माफी मांगूंगा, जहां हमने ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाया जिन्होंने पार्टी के साथ विश्वासघात किया। यह मेरी गलती थी और मैं इस गलती को स्वीकार करता हूं, क्योंकि आप सभी ने मेरे कहने पर ही उन्हें वोट दिया था।”
उद्धव ठाकरे का यह बयान ऐसे समय आया है जब हाल के दिनों में शिवसेना (UBT) को लगातार राजनीतिक झटके लगे हैं। पार्टी के कई सांसदों ने संगठन छोड़ दिया और अलग राजनीतिक रास्ता अपना लिया। इन घटनाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं और शिवसेना (UBT) के सामने अपने जनाधार को बचाने की चुनौती खड़ी कर दी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उद्धव ठाकरे ने अपनी रणनीति को केवल बागी नेताओं की आलोचना तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि उन्होंने सीधे मतदाताओं से संवाद का रास्ता चुना है। भारतीय राजनीति में बहुत कम अवसर देखने को मिलते हैं, जब कोई बड़ा नेता सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करे कि उम्मीदवार के चयन में उससे गलती हुई थी। यही कारण है कि उद्धव ठाकरे का यह अभियान राजनीतिक और भावनात्मक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शिवसेना (UBT) के अनुसार, जिन सांसदों ने पार्टी छोड़ी है, उनके संसदीय क्षेत्रों में विरोध की शुरुआत पहले ही हो चुकी है। पार्टी समर्थक कई स्थानों पर प्रदर्शन कर रहे हैं और बागी सांसदों के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। पार्टी का दावा है कि मतदाताओं के साथ जनादेश का विश्वासघात हुआ है और अब उसी जनता के बीच जाकर सच्चाई रखने का समय आ गया है।
महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल का मुद्दा नया नहीं है। 2022 में शिवसेना में बड़ी टूट के बाद राज्य की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी। इसके बाद पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर भी लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चली। अब लोकसभा चुनाव के बाद सांसदों के स्तर पर हुए नए घटनाक्रम ने उद्धव ठाकरे की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। ऐसे में उनका यह अभियान केवल खोए हुए राजनीतिक आधार को वापस पाने का प्रयास नहीं, बल्कि संगठन के प्रति वफादार कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की भी कोशिश माना जा रहा है।
उद्धव ठाकरे ने अपने बयान में सीधे तौर पर उन सांसदों पर निशाना साधा जिन्हें उन्होंने पार्टी का “विश्वासघाती” बताया। उनका कहना है कि जनता ने उन व्यक्तियों को नहीं, बल्कि शिवसेना और उसके विचारों को वोट दिया था। इसलिए यदि जनादेश लेकर कोई प्रतिनिधि बीच रास्ते में पार्टी छोड़ देता है, तो नैतिक जिम्मेदारी केवल उस सांसद की नहीं, बल्कि उसे उम्मीदवार बनाने वाले नेतृत्व की भी बनती है। इसी नैतिक जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए उन्होंने जनता से माफी मांगने का निर्णय लिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह अभियान महाराष्ट्र में भावनात्मक राजनीति का नया अध्याय बन सकता है। भारतीय चुनावों में मतदाता अक्सर उन नेताओं को सकारात्मक रूप से देखते हैं जो अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि बागी सांसद अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेंगे और उद्धव ठाकरे के आरोपों का जवाब देंगे। इसलिए आने वाले दिनों में इन संसदीय क्षेत्रों में राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म होने की संभावना है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि उद्धव ठाकरे का यह कदम केवल वर्तमान सांसदों को घेरने के लिए नहीं है, बल्कि आगामी विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों के लिए संगठन को फिर से सक्रिय करने की रणनीति भी है। जनता के बीच जाकर संवाद स्थापित करना, कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरना और यह संदेश देना कि पार्टी नेतृत्व अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस रखता है—ये सभी इस अभियान के महत्वपूर्ण उद्देश्य माने जा रहे हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि उद्धव ठाकरे सबसे पहले किस संसदीय क्षेत्र से अपने दौरे की शुरुआत करेंगे, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जा रही है और जल्द ही विस्तृत कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी।
अब महाराष्ट्र की राजनीति की नजरें इस अभियान पर टिकी हैं। क्या उद्धव ठाकरे की सार्वजनिक माफी मतदाताओं की सहानुभूति हासिल कर पाएगी? क्या बागी सांसद अपने क्षेत्रों में जनता के सवालों का सामना कर पाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल—क्या यह अभियान शिवसेना (UBT) के लिए राजनीतिक पुनरुत्थान की शुरुआत साबित होगा या फिर महाराष्ट्र की राजनीति में एक और बड़ा संघर्ष देखने को मिलेगा? आने वाले दिनों में इसका जवाब जनता ही देगी।




