ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 जून 2026
भारतीय राजनीति एक बार फिर गठबंधनों के दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय पार्टियों के बीच कई बार मतभेद सामने आए, लेकिन जैसे-जैसे अगला लोकसभा चुनाव नजदीक आता जा रहा है, विपक्षी एकता की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है। यही वजह है कि INDIA गठबंधन को लेकर लगातार चर्चा हो रही है और राजनीतिक गलियारों में इसके भविष्य को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो कई क्षेत्रीय दलों के सामने चुनौती यह है कि वे अपने राज्यों में मजबूत बने रहने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव बनाए रखें। ऐसे में तमिलनाडु की DMK और आम आदमी पार्टी जैसे दलों के लिए विपक्षी एकता से अलग राह चुनना आसान नहीं दिखाई देता। भाजपा जैसी विशाल चुनावी मशीनरी का मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों को साझा रणनीति और साझा मंच की जरूरत महसूस हो रही है।
विपक्षी राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती वोटों के बंटवारे की रही है। कई राज्यों में देखा गया है कि विपक्षी दल अलग-अलग चुनाव लड़ते हैं तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलता है। इसी कारण विपक्ष के भीतर यह सोच मजबूत हो रही है कि लोकसभा चुनाव में अधिकतम सीटों पर एक साझा उम्मीदवार उतारा जाए। यदि ऐसा होता है तो विपक्षी वोटों के विभाजन को काफी हद तक रोका जा सकता है और चुनावी मुकाबला अधिक सीधा हो सकता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति भी आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन सकती है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी आज विपक्ष की सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में गिनी जाती हैं। यदि विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए वह खुद किसी महत्वपूर्ण लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरती हैं, तो इसका राजनीतिक संदेश केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे देश में जाएगा। यह विपक्षी एकता और साझा नेतृत्व की दिशा में एक बड़ा संकेत माना जाएगा।
हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के संबंधों को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई गईं। हालांकि वास्तविकता यह है कि दोनों दलों का पूर्ण विलय राजनीतिक रूप से बेहद कठिन और लगभग असंभव दिखाई देता है। दोनों दलों की अपनी अलग राजनीतिक पहचान, संगठनात्मक संरचना और क्षेत्रीय हित हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे चुनावी सहयोग नहीं कर सकते। भारतीय राजनीति में गठबंधन और विलय दो अलग-अलग बातें हैं, और विपक्षी दलों की प्राथमिकता फिलहाल विलय नहीं बल्कि चुनावी तालमेल लगती है।
कांग्रेस आज भी देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। कई राज्यों में उसका संगठनात्मक ढांचा मौजूद है और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्वीकार्यता भी बनी हुई है। यही कारण है कि विपक्षी राजनीति में कांग्रेस की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज करना किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए आसान नहीं है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने राज्यों में मजबूत जनाधार रखते हैं और उनकी राजनीतिक उपयोगिता लगातार बनी हुई है। इसलिए भविष्य की राजनीति संभवतः साझेदारी और समन्वय पर आधारित होगी, न कि किसी एक दल के प्रभुत्व पर।
आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति में गठबंधन की राजनीति और तेज होने की संभावना है। सीट बंटवारे, साझा उम्मीदवार, क्षेत्रीय नेतृत्व और राष्ट्रीय एजेंडा जैसे मुद्दे विपक्षी दलों के बीच प्रमुख चर्चा के विषय रहेंगे। भाजपा के मुकाबले प्रभावी चुनौती खड़ी करने के लिए विपक्ष को केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर व्यावहारिक चुनावी रणनीति बनानी होगी।
इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि INDIA गठबंधन बचेगा या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विपक्ष अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर एक ऐसी साझा राजनीतिक ताकत बना पाएगा जो राष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत कर सके। आने वाले महीनों में इसी सवाल का जवाब भारतीय राजनीति की दिशा तय करेगा।




