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ईरान-अमेरिका शांति समझौते पर दुनिया की नजर, 19 जून को हस्ताक्षर; लेकिन तेहरान बोला- अमेरिका पर अब भी गहरा अविश्वास

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तेहरान/वॉशिंगटन | 15 जून 2026

अमेरिका और ईरान के बीच लगभग चार महीने तक चले भीषण संघर्ष को समाप्त करने के लिए हुए ऐतिहासिक शांति समझौते का दुनिया भर में स्वागत हो रहा है। 19 जून को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होने हैं, लेकिन इसके बीच ईरान ने साफ कर दिया है कि समझौते के बावजूद अमेरिका पर उसका भरोसा अभी भी नहीं लौटा है।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि अमेरिका के साथ हुए समझौते को लेकर तेहरान में अब भी “गहरा अविश्वास” मौजूद है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी सरकारों के लंबे इतिहास और पिछले अनुभवों के कारण ईरानी जनता का विश्वास जीतना अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा। उनके अनुसार यह समझौता केवल युद्ध रोकने और तनाव कम करने की दिशा में पहला कदम है।

दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस समझौते को “शांति की दिशा में ऐतिहासिक कदम” बताया है। पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसने दोनों देशों के बीच मध्यस्थता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शहबाज शरीफ ने कहा कि युद्ध के अंधकार के बाद अब शांति का सूरज उग रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनिया के कई बड़े नेताओं ने भी समझौते का स्वागत किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पश्चिम एशिया में शांति की बहाली से वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी और समुद्री व्यापार फिर सामान्य हो सकेगा। चीन, मिस्र, इंडोनेशिया, इराक और तुर्किये ने भी इस समझौते का समर्थन किया है।

समझौते के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य का दोबारा खुलना है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन इसी मार्ग से होता है। युद्ध के कारण यह मार्ग महीनों तक प्रभावित रहा, जिससे वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर भारी असर पड़ा। हालांकि ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह जहाजों से टोल टैक्स नहीं बल्कि समुद्री सेवाओं, पर्यावरण सुरक्षा और बीमा जैसी सुविधाओं के लिए सेवा शुल्क वसूल करेगा।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि फ्रांस और ब्रिटेन जरूरत पड़ने पर होर्मुज क्षेत्र में संयुक्त मिशन तैनात करने के लिए तैयार हैं ताकि समुद्री मार्ग सुरक्षित रह सके। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में लाना जरूरी होगा।

इस बीच रूस ने उम्मीद जताई है कि शांति समझौते पर इस सप्ताह हस्ताक्षर हो जाएंगे, जबकि लेबनान में हिज्बुल्लाह ने दावा किया है कि समझौते की घोषणा के बाद से उसने कोई सैन्य कार्रवाई नहीं की है। वहीं इजराइल के कुछ दक्षिणपंथी नेताओं ने इस समझौते की आलोचना करते हुए कहा है कि यह उनके देश की सुरक्षा चिंताओं का समाधान नहीं करता।

विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की असली परीक्षा 19 जून के बाद शुरू होगी। युद्ध रोकने की घोषणा करना एक बात है, लेकिन दशकों पुराने अविश्वास, प्रतिबंधों, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय संघर्षों के बीच स्थायी शांति कायम करना कहीं अधिक कठिन चुनौती होगी।

दुनिया की नजर जिनेवा में होने वाले उस ऐतिहासिक हस्ताक्षर समारोह पर टिकी है, जो सफल होने पर पश्चिम एशिया की राजनीति, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का नया अध्याय लिख सकता है।

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