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15 लाख करोड़ रुपये का सवाल: क्या भारत की कॉरपोरेट दुनिया की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू हो चुकी है?

प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 जून 2026

भारतीय शेयर बाजार ने कई बड़े घोटाले, विवाद और कॉरपोरेट संकट देखे हैं। लेकिन राजेश एक्सपोर्ट्स से जुड़ा ताजा मामला अपने आकार और प्रभाव के कारण बिल्कुल अलग दिखाई देता है। यहां सवाल किसी हजार या लाख करोड़ रुपये का नहीं है। यहां चर्चा लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये की है। यह इतनी बड़ी रकम है कि आम आदमी के लिए इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। यह राशि भारत के वार्षिक केंद्रीय बजट के बड़े हिस्से के बराबर बैठती है। यही कारण है कि सेबी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट ने निवेशकों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों और पूरे कॉरपोरेट जगत को चौंका दिया है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि सेबी ने अभी तक यह नहीं कहा है कि 15.15 लाख करोड़ रुपये किसी ने चुरा लिए या यह पैसा गायब हो गया। असली सवाल कहीं अधिक गंभीर है। सेबी यह जानना चाहती है कि क्या कंपनी ने अपनी आय और कारोबार का आकार वास्तविकता से कहीं ज्यादा दिखाया था। यदि ऐसा हुआ है तो निवेशकों, बैंकों और बाजार को कंपनी की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर दिखाई गई होगी। यह केवल अकाउंटिंग की गलती नहीं होगी बल्कि बाजार के भरोसे से जुड़ा मामला बन जाएगा।

इस पूरे विवाद के केंद्र में स्विट्जरलैंड की मशहूर गोल्ड रिफाइनरी वालकैम्बी (Valcambi) है। जब राजेश एक्सपोर्ट्स ने वर्ष 2015 में वालकैम्बी का अधिग्रहण किया था तब इसे भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की बड़ी उपलब्धि माना गया था। उस समय कहा गया था कि एक भारतीय कंपनी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सोना शोधन संस्थानों में से एक की मालिक बन गई है। इससे राजेश एक्सपोर्ट्स की अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रतिष्ठा दोनों बढ़ीं। कई निवेशकों ने इसे कंपनी के सुनहरे भविष्य का संकेत माना था। लेकिन आज वही वालकैम्बी इस पूरे विवाद का सबसे चर्चित नाम बन गई है।

हालांकि अभी तक किसी नियामक एजेंसी ने यह नहीं कहा है कि वालकैम्बी ने कोई धोखाधड़ी की है। कुछ विशेषज्ञ तो यह भी मानते हैं कि वालकैम्बी के खातों और दस्तावेजों ने ही सेबी को उन सवालों तक पहुंचाया जिनकी वजह से यह जांच शुरू हुई। यानी संभव है कि वालकैम्बी इस कहानी की आरोपी नहीं बल्कि वह खिड़की हो जिसके जरिए पूरे मामले की परतें खुलनी शुरू हुईं।

राजेश एक्सपोर्ट्स का कहना है कि पूरा विवाद अलग-अलग अकाउंटिंग सिस्टम को लेकर पैदा हुआ है। कंपनी का तर्क है कि वालकैम्बी के खातों में मुख्य रूप से रिफाइनिंग फीस और प्रोसेसिंग चार्ज दिखाई देते हैं, जबकि समूह के संयुक्त खातों में सोने के कुल कारोबार का मूल्य भी शामिल होता है। सोने का कारोबार सामान्य उद्योगों से अलग होता है। यहां अरबों-खरबों रुपये मूल्य का सोना हाथ बदल सकता है जबकि कंपनी का वास्तविक मुनाफा उस राशि का बहुत छोटा हिस्सा होता है। यदि कंपनी का यह तर्क सही साबित होता है तो मामला धोखाधड़ी का नहीं बल्कि अकाउंटिंग और खुलासे की तकनीकी व्याख्या का बन सकता है। लेकिन यदि जांच एजेंसियां यह निष्कर्ष निकालती हैं कि आय को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया था, तब इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण और सबसे असहज सवाल यह है कि यदि वास्तव में कोई गड़बड़ी थी तो इतने वर्षों तक किसी को दिखाई क्यों नहीं दी? कंपनी के खातों का हर वर्ष ऑडिट हुआ। स्वतंत्र निदेशक मौजूद थे। ऑडिट कमेटियां थीं। बड़े निवेशक थे। बाजार विश्लेषक थे। विदेशी निवेशक थे। फिर भी यदि इतने बड़े अंतर की बात सामने आ रही है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि निगरानी व्यवस्था में चूक कहां हुई?

यहीं से यह मामला केवल राजेश एक्सपोर्ट्स का नहीं रह जाता बल्कि पूरे कॉरपोरेट प्रशासन यानी कॉरपोरेट गवर्नेंस का मामला बन जाता है। किसी भी आधुनिक कंपनी में ऑडिटर, स्वतंत्र निदेशक और ऑडिट कमेटियां इसलिए होती हैं ताकि वे प्रबंधन के दावों की जांच कर सकें और छोटे निवेशकों के हितों की रक्षा कर सकें। यदि इतनी बड़ी कंपनी में इतने बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं तो यह देखना जरूरी होगा कि इन संस्थाओं ने अपनी जिम्मेदारियां कितनी प्रभावी ढंग से निभाईं।

एक और महत्वपूर्ण पहलू है कि इस दौरान कई बड़े विदेशी निवेशकों और संस्थागत निवेशकों ने कंपनी में अपनी हिस्सेदारी कम की जबकि छोटे निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ती गई। इसका मतलब यह है कि जिन निवेशकों के पास अधिक संसाधन और विशेषज्ञता थी वे धीरे-धीरे बाहर निकलते गए और उनकी जगह आम निवेशकों ने ले ली। यह संयोग भी हो सकता है और जांच का विषय भी। क्योंकि यदि भविष्य में आरोप सही साबित होते हैं तो यह देखना जरूरी होगा कि आखिर इस पूरी प्रक्रिया से लाभ किसे मिला और नुकसान किसे उठाना पड़ा।

इस विवाद में एलआईसी (LIC) का नाम भी चर्चा में है। एलआईसी कंपनी के सबसे बड़े संस्थागत निवेशकों में से एक है और उसके पास लगभग 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई जाती है। एलआईसी का पैसा किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की जीवन भर की बचत का पैसा है। इसलिए अब यह सवाल भी उठ रहा है कि सार्वजनिक धन का निवेश करने वाली संस्थाएं कंपनियों की निगरानी किस स्तर तक करती हैं। क्या केवल वित्तीय रिपोर्टों पर भरोसा किया जाता है या स्वतंत्र मूल्यांकन भी होता है?

दरअसल इस पूरे मामले की सबसे बड़ी चिंता 15 लाख करोड़ रुपये नहीं है। सबसे बड़ी चिंता है भरोसा। शेयर बाजार विश्वास पर चलता है। निवेशक यह मानकर पैसा लगाता है कि कंपनी सही जानकारी दे रही है, ऑडिटर अपना काम कर रहे हैं और नियामक संस्थाएं निगरानी कर रही हैं। यदि यह विश्वास कमजोर पड़ता है तो नुकसान केवल एक कंपनी को नहीं बल्कि पूरे बाजार को होता है।

अब आगे क्या होगा? सेबी दस्तावेजों और लेन-देन की गहराई से जांच करेगी। जरूरत पड़ने पर स्विट्जरलैंड की एजेंसियों से भी सहयोग लिया जा सकता है। ऑडिट रिपोर्टों की समीक्षा होगी। ऑडिट कमेटियों और निदेशक मंडल की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। संस्थागत निवेशक अधिक पारदर्शिता की मांग कर सकते हैं और विदेशी कारोबार वाली भारतीय कंपनियों के लिए नए नियम भी बन सकते हैं।

लेकिन अंत में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या भारत की वित्तीय और नियामक व्यवस्था इतनी मजबूत है कि वह ऐसे मामलों को समय रहते पकड़ सके? या फिर हमें हर बार संकट पैदा होने के बाद ही जागना पड़ेगा?

राजेश एक्सपोर्ट्स और वालकैम्बी का मामला केवल एक कंपनी की कहानी नहीं है। यह भारत के कॉरपोरेट प्रशासन, ऑडिट व्यवस्था, नियामक संस्थाओं और निवेशकों के भरोसे की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक बन सकता है। आने वाले महीनों में यह तय होगा कि सच क्या है। लेकिन एक बात अभी से साफ है कि यह मामला वर्षों तक कॉरपोरेट गवर्नेंस की बहस का हिस्सा बना रहेगा।

क्योंकि बाजार में पैसा महत्वपूर्ण होता है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है भरोसा। पैसा खोकर फिर कमाया जा सकता है, लेकिन एक बार टूटा हुआ भरोसा वापस बनाने में कई साल लग जाते हैं।

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