अंतरराष्ट्रीय / विश्लेषण | ABC NATIONAL NEWS | 14 जून 2026
कुछ महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को भरोसा था कि ईरान पर सैन्य दबाव बनाकर उसे कुछ ही हफ्तों में झुकने पर मजबूर कर दिया जाएगा। अनुमान लगाया गया था कि शीर्ष नेतृत्व पर हमलों और आर्थिक दबाव के बाद ईरान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता पैदा होगी और तेहरान समझौते की शर्तें मानने को विवश हो जाएगा। लेकिन युद्ध के कई महीनों बाद तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होने वाला है। एक के बाद एक घोषणाएं की जा रही हैं, लेकिन ईरान की ओर से अब तक कोई अंतिम पुष्टि नहीं आई है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वास्तव में वाशिंगटन अपनी घोषित रणनीति हासिल कर पाया है, या फिर परिस्थितियों ने उसे समझौते की राह पर चलने के लिए मजबूर कर दिया है।
सबसे बड़ा झटका हॉर्मुज जलडमरूमध्य के मोर्चे पर दिखाई दिया। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल हॉर्मुज में लंबे समय तक तनाव बना रहा। तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हुई, बीमा लागत बढ़ी और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता फैल गई। आलोचकों का कहना है कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य और नौसैनिक ताकत होने के बावजूद अमेरिका हॉर्मुज में पूरी तरह अपनी शर्तें लागू नहीं कर सका। कई रिपोर्टों और दावों के अनुसार वार्ताओं में ईरान की भूमिका और प्रभाव को स्वीकार करना पड़ा, जिसने इस संघर्ष की दिशा बदल दी।
अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध के राजनीतिक परिणाम सामने आने लगे हैं। कई जनमत सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता पर दबाव दिखाई दे रहा है। विपक्षी डेमोक्रेट नेताओं के साथ-साथ कुछ रिपब्लिकन हलकों में भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह संघर्ष अमेरिका के लिए रणनीतिक लाभ लेकर आया या केवल आर्थिक और राजनीतिक बोझ बढ़ाकर गया। महंगाई, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक अनिश्चितता ने अमेरिकी मतदाताओं के बीच चिंता बढ़ाई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष जारी रहा तो आगामी संसदीय चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। अमेरिकी कांग्रेस में बहुमत कमजोर होने की स्थिति में ट्रंप प्रशासन की कई नीतियां और नियुक्तियां अटक सकती हैं। यही कारण है कि व्हाइट हाउस पर जल्द से जल्द किसी कूटनीतिक समाधान तक पहुंचने का दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।
ईरान की ओर से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि वह अपनी संप्रभुता, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय हितों पर समझौता करने को तैयार नहीं है। तेहरान का दावा है कि उसने भारी सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद अपनी रणनीतिक स्थिति बनाए रखी है। ईरानी नेतृत्व इसे राष्ट्रीय आत्मसम्मान और प्रतिरोध की जीत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। भारत सहित कई देशों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है। तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन पर पड़ने वाला प्रभाव सीधे तौर पर एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करता है।
हालांकि यह भी सच है कि युद्ध और कूटनीति के परिणामों का अंतिम आकलन अभी बाकी है। अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने दावे कर रहे हैं और वास्तविक समझौते की शर्तें सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि किस पक्ष ने क्या हासिल किया। लेकिन इतना तय है कि इस संघर्ष ने वैश्विक राजनीति के समीकरण बदल दिए हैं और यह बहस तेज कर दी है कि क्या सैन्य शक्ति हमेशा राजनीतिक सफलता की गारंटी होती है, या अंततः कूटनीति और जनमत ही निर्णायक भूमिका निभाते हैं।




