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राज्यसभा नामांकन रद्द करने पर सुप्रीम कोर्ट में संग्राम: कपिल सिब्बल बोले- बिना आरोप तय हुए उम्मीदवार कैसे अयोग्य?

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 जून 2026

कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा नामांकन पत्र को खारिज किए जाने का मामला शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस का विषय बन गया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में निर्वाचन अधिकारी (Returning Officer) के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि नामांकन रद्द करना कानून और लोकतांत्रिक प्रक्रिया दोनों के खिलाफ है।

सिब्बल ने दलील दी कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 33A स्पष्ट रूप से कहती है कि उम्मीदवार को केवल उन्हीं आपराधिक मामलों की जानकारी देनी होती है जिनमें दो वर्ष या उससे अधिक सजा का प्रावधान हो और अदालत द्वारा आरोप तय (Charges Framed) किए जा चुके हों। उन्होंने कहा कि मीनाक्षी नटराजन के मामले में न तो आरोप तय हुए हैं और न ही शिकायत पर अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने की स्थिति स्पष्ट है। ऐसे में नामांकन रद्द करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने निर्वाचन अधिकारी के फैसले को “स्पष्ट कानूनी त्रुटि” बताते हुए कहा कि यदि ऐसे फैसलों को वैध माना गया तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मूल भावना को गहरा आघात पहुंचेगा। उन्होंने तर्क दिया कि चुनावी प्रक्रिया में सभी उम्मीदवारों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है और किसी उम्मीदवार को विवादित या गलत कानूनी व्याख्या के आधार पर चुनावी मैदान से बाहर नहीं किया जा सकता।

मामले ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या चुनाव अधिकारी किसी शिकायत या अधूरी कानूनी प्रक्रिया के आधार पर किसी उम्मीदवार का नामांकन खारिज कर सकते हैं? विपक्षी नेताओं और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नामांकन रद्द करने की शक्ति का प्रयोग व्यापक और विवादित आधारों पर किया गया तो इससे चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला केवल मीनाक्षी नटराजन के मामले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर भविष्य में उम्मीदवारों द्वारा आपराधिक मामलों के खुलासे, नामांकन प्रक्रिया की वैधता और चुनाव अधिकारियों की शक्तियों की सीमा पर भी पड़ सकता है। राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर अब अदालत के अगले कदम पर टिकी हुई है, क्योंकि यह फैसला भारतीय चुनावी व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित कर सकता है।

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