ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 जून 2026
करीब 100 दिन पहले राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर खुली चुनौती दी थी। राहुल गांधी का आरोप था कि यह समझौता भारत के दीर्घकालिक आर्थिक हितों के खिलाफ है और इससे भारतीय उद्योग, किसानों तथा छोटे व्यापारियों को भारी नुकसान हो सकता है। उस समय भाजपा और सरकार समर्थकों ने इन आशंकाओं को राजनीति से प्रेरित बताया था, लेकिन अब विपक्ष दावा कर रहा है कि घटनाक्रम राहुल गांधी की चेतावनी को सही साबित कर रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि अमेरिका के साथ बढ़ते आर्थिक समझौतों का सबसे बड़ा लाभ देश के आम नागरिकों या छोटे उद्योगों को नहीं, बल्कि कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को मिला है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि मुकेश अंबानी समूह को अमेरिका में विशाल ऊर्जा और रिफाइनिंग परियोजनाओं में अभूतपूर्व अवसर मिले हैं, जबकि गौतम अडानी समूह से जुड़े कानूनी और व्यावसायिक विवादों में भी राहत का माहौल दिखाई दिया है। विपक्ष इसे संयोग नहीं बल्कि बड़े आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों का हिस्सा बताता है।
कांग्रेस का आरोप है कि भारत को अगले पांच वर्षों में अमेरिका के साथ 500 अरब डॉलर के व्यापारिक लक्ष्य की दिशा में धकेला जा रहा है, जबकि इस प्रक्रिया में भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और घरेलू बाजार की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। विशेष रूप से वस्त्र उद्योग, लघु एवं मध्यम उद्योगों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लेकर विपक्ष चिंता जता रहा है। उनका कहना है कि यदि सस्ते आयात और असमान प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ता है तो लाखों रोजगार प्रभावित हो सकते हैं।
राहुल गांधी लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि भारत को किसी भी वैश्विक शक्ति के साथ संबंध बराबरी और राष्ट्रीय हितों के आधार पर रखने चाहिए। उनका कहना है कि आर्थिक साझेदारी का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि घरेलू उद्योगों और रोजगार की कीमत पर विदेशी हितों को प्राथमिकता दी जाए। कांग्रेस का दावा है कि वर्तमान सरकार रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक निर्भरता के बीच की रेखा को धुंधला कर रही है।
हालांकि सरकार और भाजपा इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हैं। उनका कहना है कि भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और अमेरिका सहित प्रमुख देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध देश के विकास, निवेश और रोजगार के लिए जरूरी हैं। सरकार का तर्क है कि बड़े निवेश और वैश्विक साझेदारियां भारत को विनिर्माण और तकनीकी शक्ति बनाने में मदद करेंगी।
फिर भी विपक्ष का सवाल कायम है। यदि किसी व्यापारिक समझौते से कुछ बड़े कॉरपोरेट समूहों को भारी लाभ मिलता है लेकिन छोटे उद्योग, किसान और श्रमिक खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं, तो उस समझौते की सफलता का आकलन कैसे किया जाएगा? यही वह राजनीतिक प्रश्न है जिसे राहुल गांधी और विपक्ष लगातार उठाते रहे हैं।
विपक्ष का निष्कर्ष साफ है— यदि आर्थिक नीतियों का सबसे बड़ा लाभ सत्ता के करीबी उद्योगपतियों तक सीमित रह जाए और आम भारतीय को उसका लाभ न मिले, तो इसे राष्ट्रीय सफलता नहीं कहा जा सकता। कांग्रेस इसी आधार पर दावा कर रही है कि राहुल गांधी की आशंकाएं सही साबित हो रही हैं और आने वाले समय में यह मुद्दा भारतीय राजनीति की बड़ी बहस बन सकता है।




