राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/कोलकाता | 12 जून 2026
पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का संकट अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। पार्टी के बागी सांसदों ने अब सीधे तौर पर खुद को “असली टीएमसी” बताने की तैयारी शुरू कर दी है। बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने घोषणा की है कि 15 जून को उनका गुट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात करेगा और संसद में “वास्तविक टीएमसी” के रूप में मान्यता देने की मांग करेगा।
बसुनिया का दावा है कि उनके साथ टीएमसी के 19 लोकसभा सांसद हैं, जो पार्टी की कुल संसदीय ताकत का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा बनते हैं। यही संख्या उन्हें दल-बदल कानून के तहत कानूनी सुरक्षा और पार्टी पर दावा करने का आधार दे सकती है।
राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के विभाजन से की जा रही है, जहां बागी गुटों ने बाद में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक दिया था। टीएमसी के भीतर भी अब वैसी ही लड़ाई की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, बागी सांसद लोकसभा में अलग समूह के रूप में बैठने और भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं। हालांकि उनका दावा है कि वे भाजपा में शामिल नहीं हो रहे, बल्कि टीएमसी की “मूल विचारधारा” को बचाने के लिए अलग रास्ता अपना रहे हैं।
उधर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला आधिकारिक टीएमसी खेमे ने बागियों के दावों को खारिज कर दिया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि बागी सांसदों के पास उतना समर्थन नहीं है जितना वे दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद लगातार बागी गुट के दावों पर सवाल उठा रहे हैं।
टीएमसी के भीतर यह संकट ऐसे समय पैदा हुआ है जब पार्टी पहले ही विधानसभा चुनाव में करारी हार, नेतृत्व विवाद और संगठनात्मक असंतोष से जूझ रही है। कई सांसदों और नेताओं ने खुलकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।
यदि बागी सांसदों का दावा सफल होता है तो यह केवल संसदीय दल का विभाजन नहीं होगा, बल्कि ममता बनर्जी के तीन दशक पुराने राजनीतिक साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोमवार को ओम बिरला से होने वाली मुलाकात टीएमसी के भविष्य की दिशा तय कर सकती है।
अब सबकी निगाहें 15 जून पर टिकी हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कितने सांसद बागी खेमे के साथ हैं, बल्कि यह भी है कि क्या तृणमूल कांग्रेस भी शिवसेना और एनसीपी की तरह दो हिस्सों में बंटने जा रही है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या ममता बनर्जी अपनी ही पार्टी पर नियंत्रण बनाए रख पाएंगी?




