राष्ट्रीय / साइंस एंड टेक्नोलॉजी | अवधेश झा | नई दिल्ली ABC NATIONAL NEWS
2027 से सेना में होगी तैनाती
भारत ने सीमा सुरक्षा और रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भारतीय सेना के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया स्वदेशी हल्का युद्धक टैंक “ज़ोरावर” अब अंतिम परीक्षणों के बाद सेना में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है। चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बढ़ती चुनौतियों और ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में सैन्य क्षमता बढ़ाने की जरूरत को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया यह टैंक भारत की रक्षा रणनीति में गेम चेंजर साबित हो सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ज़ोरावर न केवल लद्दाख और हिमालयी क्षेत्रों में भारतीय सेना की ताकत बढ़ाएगा, बल्कि यह दुनिया को यह संदेश भी देगा कि भारत अब अत्याधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म विकसित करने में आत्मनिर्भर बन रहा है।
ज़ोरावर टैंक का विकास उस समय शुरू हुआ था जब पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव चरम पर था। उस दौरान चीन ने अपने टाइप-15 लाइट टैंकों को सीमा क्षेत्रों में तैनात किया था। इसके जवाब में भारतीय सेना को ऐसे हल्के लेकिन शक्तिशाली टैंक की आवश्यकता महसूस हुई जो ऊंचे पहाड़ी इलाकों में आसानी से संचालित हो सके। इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए भारत ने रिकॉर्ड 19 महीनों के भीतर ज़ोरावर टैंक का विकास कर दिया। यह टैंक प्रसिद्ध डोगरा सेनापति जनरल ज़ोरावर सिंह के नाम पर रखा गया है, जिन्हें “लद्दाख का विजेता” भी कहा जाता है।
करीब 25 टन वजनी यह टैंक विशेष रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों और कम ऑक्सीजन वाले इलाकों में संचालन के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे भारतीय वायुसेना के C-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए तेजी से किसी भी रणनीतिक क्षेत्र में पहुंचाया जा सकता है। आधुनिक युद्ध में त्वरित तैनाती की क्षमता किसी भी सैन्य प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है और ज़ोरावर इस मामले में भारतीय सेना को महत्वपूर्ण बढ़त देता है।
ज़ोरावर की मारक क्षमता भी बेहद प्रभावशाली है। इसमें 105 मिमी की राइफल्ड गन लगाई गई है जो ऑटो-लोडर प्रणाली से लैस है। इसके अलावा इसमें 7.62 मिमी की को-एक्सियल मशीन गन, 12.7 मिमी का रिमोट कंट्रोल्ड हथियार स्टेशन और नाग मार्क-2 एंटी टैंक मिसाइल दागने की क्षमता भी मौजूद है। इसका मतलब है कि यह टैंक दुश्मन के बख्तरबंद वाहनों, बंकरों और सैन्य ठिकानों को दूर से ही निशाना बना सकता है। सेना भविष्य में इसमें लेजर वार्निंग रिसीवर और एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम भी जोड़ना चाहती है, जिससे इसकी सुरक्षा और बढ़ जाएगी।
टैंक में 760 हॉर्सपावर का शक्तिशाली डीजल इंजन लगाया गया है, जो इसे कठिन पहाड़ी रास्तों पर भी तेज गति से चलने की क्षमता देता है। ज़ोरावर की अधिकतम गति लगभग 70 किलोमीटर प्रति घंटा है और यह एक बार में करीब 450 किलोमीटर तक सफर कर सकता है। इसमें हाइड्रो-न्यूमेटिक सस्पेंशन सिस्टम लगाया गया है, जो ऊबड़-खाबड़ और बर्फीले इलाकों में भी इसे स्थिर बनाए रखता है। यही कारण है कि इसे लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और अन्य ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए आदर्श माना जा रहा है।
भारतीय सेना पहले भी पहाड़ी युद्ध में हल्के टैंकों का सफल उपयोग कर चुकी है। 1948 में जोजिला दर्रे पर स्टुअर्ट लाइट टैंकों की मदद से पाकिस्तान समर्थित घुसपैठियों को पीछे धकेला गया था। 1962 के भारत-चीन युद्ध में भी AMX-13 टैंकों का उपयोग किया गया था। 1965 के युद्ध में इन्हीं टैंकों ने पाकिस्तान के ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम को विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब ज़ोरावर इसी परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ आगे बढ़ाने जा रहा है।
भारतीय सेना ने फिलहाल 59 ज़ोरावर टैंकों का प्रारंभिक ऑर्डर दिया है, जबकि कुल आवश्यकता 354 लाइट टैंकों की बताई जा रही है। सरकार पहले ही सात रेजिमेंट लाइट टैंकों के गठन को मंजूरी दे चुकी है। लद्दाख के न्योमा क्षेत्र में 4,200 मीटर से अधिक ऊंचाई पर किए गए परीक्षणों में ज़ोरावर ने फायरपावर, गतिशीलता और सुरक्षा के सभी मानकों पर सफलता हासिल की है। इसके बाद माना जा रहा है कि वर्ष 2027 से इसकी औपचारिक तैनाती शुरू हो जाएगी।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ज़ोरावर केवल एक टैंक नहीं, बल्कि भारत की रक्षा निर्माण क्षमता का प्रतीक है। यह दिखाता है कि भारतीय उद्योग अब जटिल और अत्याधुनिक सैन्य प्रणालियों को कम समय में विकसित करने में सक्षम हो चुका है। इसकी सफलता भविष्य में भारत को रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी नई संभावनाएं प्रदान कर सकती है। चीन के साथ जारी सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच ज़ोरावर का आगमन भारतीय सेना को नई ताकत देने वाला कदम माना जा रहा है।




