कोलकाता | ABC NATIONAL NEWS | 6 जून 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में जारी उथल-पुथल के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बागी नेताओं के बीच टकराव अब अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। विधानसभा चुनाव में हार और उसके बाद पार्टी के भीतर शुरू हुई बगावत से जूझ रही ममता बनर्जी की पार्टी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष द्वारा बागी नेता रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष (LoP) के रूप में मान्यता दिए जाने के फैसले को चुनौती देने का फैसला किया है। तृणमूल कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह 8 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी और विधानसभा अध्यक्ष के इस निर्णय को कानूनी रूप से चुनौती देगी।
शुक्रवार शाम को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की अध्यक्षता में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मौजूदा राजनीतिक संकट और बागी विधायकों के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। बैठक के बाद पार्टी सांसद और वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा रितब्रत बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देना पूरी तरह गलत है और यह संवैधानिक तथा विधायी परंपराओं के अनुरूप नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी इस फैसले के खिलाफ न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करेगी और हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करेगी।
दरअसल, विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया है। कई विधायक पार्टी नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं और कुछ नेताओं ने अलग राजनीतिक राह पकड़ ली है। इन्हीं घटनाक्रमों के बीच बागी नेता रितब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी गई, जिससे ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला केवल एक संवैधानिक नियुक्ति नहीं बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर का संकेत भी है।
हालांकि रितब्रत बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें विपक्ष का नेता बनाए जाने की प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक और नियमों के अनुरूप हुई है। उनका दावा है कि विधानसभा अध्यक्ष ने सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद ही यह निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस अपनी राजनीतिक असफलताओं और आंतरिक संकट को छिपाने के लिए इस मुद्दे को विवादित बनाने की कोशिश कर रही है।
बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस लगातार आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रही है। चुनावी हार के बाद पार्टी के कई नेता और विधायक नेतृत्व से नाराज दिखाई दिए हैं। कुछ बागी विधायकों ने तो यहां तक कहा है कि पार्टी को नए ढांचे और नई दिशा की जरूरत है। दूसरी ओर ममता बनर्जी लगातार संगठन को एकजुट रखने और टूट को रोकने के प्रयास कर रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि हाईकोर्ट इस मामले में सुनवाई स्वीकार करता है तो यह केवल नेता प्रतिपक्ष की मान्यता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि विधानसभा अध्यक्ष के अधिकारों, दल-बदल की राजनीति और विपक्षी नेतृत्व की वैधता जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर भी बहस छिड़ सकती है। ऐसे में इस मामले के दूरगामी राजनीतिक और कानूनी प्रभाव पड़ने की संभावना है।
फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में अस्थिरता और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। एक तरफ ममता बनर्जी अपनी पार्टी को टूटने से बचाने में जुटी हैं, तो दूसरी तरफ बागी खेमे का आत्मविश्वास लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब सबकी नजर 8 जून पर टिकी है, जब तृणमूल कांग्रेस हाईकोर्ट में अपनी चुनौती पेश करेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस मामले में क्या रुख अपनाती है और क्या यह कानूनी लड़ाई बंगाल की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत साबित होती है।




