व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 जून 2026
स्टील और कार्बन टैक्स विवाद से बढ़ा तनाव
भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के क्रियान्वयन पर अब गंभीर चुनौतियां सामने आने लगी हैं। दोनों देशों के बीच जुलाई 2025 में हस्ताक्षरित इस ऐतिहासिक समझौते को व्यापारिक संबंधों के नए युग की शुरुआत माना गया था, लेकिन ब्रिटेन की स्टील सुरक्षा नीति (Steel Safeguard Measures) और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) अब इस समझौते के सामने सबसे बड़ी बाधा बनकर उभरे हैं। सूत्रों के अनुसार भारत ने साफ संकेत दिया है कि यदि ब्रिटेन ने इन मुद्दों पर संतोषजनक समाधान नहीं निकाला तो नई दिल्ली समझौते के तहत दी गई कुछ महत्वपूर्ण शुल्क रियायतों की समीक्षा कर सकती है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मंगलवार को ब्रिटेन के व्यापार एवं उद्योग सचिव पीटर काइल और भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के बीच होने वाली बैठक में यही मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। दोनों देशों के अधिकारी पिछले कई महीनों से इन विवादित प्रावधानों पर बातचीत कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आ सका है। भारत का मानना है कि ब्रिटेन की नई नीतियां मुक्त व्यापार समझौते की मूल भावना के विपरीत हैं और भारतीय निर्यातकों के लिए कृत्रिम बाधाएं पैदा कर रही हैं।
सबसे बड़ा विवाद ब्रिटेन की स्टील सुरक्षा व्यवस्था को लेकर है। भारत का कहना है कि एक ओर ब्रिटेन भारतीय वस्तुओं के लिए बाजार खोलने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर स्टील आयात पर सुरक्षा प्रतिबंध लगाकर भारतीय उद्योगों के लिए व्यापारिक अवसर सीमित कर रहा है। भारतीय अधिकारियों का तर्क है कि यदि एफटीए का उद्देश्य दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाना है तो ऐसे प्रतिबंधात्मक कदम उस लक्ष्य को कमजोर करते हैं। भारतीय स्टील उद्योग पहले ही वैश्विक प्रतिस्पर्धा और बढ़ती लागत के दबाव का सामना कर रहा है, ऐसे में ब्रिटेन की नई नीतियां भारतीय निर्यातकों के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती हैं।
दूसरा और उससे भी अधिक संवेदनशील मुद्दा कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) है। इस व्यवस्था के तहत उन देशों से आयातित उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है जहां उत्पादन प्रक्रिया के दौरान कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। भारत सहित कई विकासशील देशों का मानना है कि यह नीति पर्यावरण संरक्षण के नाम पर एक नए प्रकार का व्यापारिक संरक्षणवाद है। भारतीय उद्योग जगत का तर्क है कि विकसित देशों ने दशकों तक औद्योगीकरण के दौरान भारी कार्बन उत्सर्जन किया और अब विकासशील देशों पर अतिरिक्त बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है।
सूत्रों के अनुसार भारत ने ब्रिटेन को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि स्टील और कार्बन टैक्स से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं हुआ तो भारत भी जवाबी कदम उठा सकता है। इनमें विशेष रूप से स्कॉटिश व्हिस्की जैसे उत्पादों को दी गई शुल्क रियायतों की समीक्षा शामिल हो सकती है। यह कदम ब्रिटेन के लिए बड़ा आर्थिक झटका साबित हो सकता है क्योंकि भारतीय बाजार दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते उपभोक्ता बाजारों में से एक है और स्कॉटिश व्हिस्की उद्योग भारत को एक महत्वपूर्ण निर्यात गंतव्य मानता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह विवाद केवल भारत और ब्रिटेन तक सीमित नहीं है बल्कि भविष्य के वैश्विक व्यापार मॉडल को भी प्रभावित कर सकता है। दुनिया भर में कार्बन टैक्स और पर्यावरण आधारित व्यापार नियमों को लेकर बहस तेज हो रही है। विकासशील देशों का आरोप है कि विकसित राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के नाम पर नए व्यापारिक अवरोध खड़े कर रहे हैं, जबकि विकसित देशों का तर्क है कि वैश्विक उत्सर्जन कम करने के लिए ऐसे कदम आवश्यक हैं।
भारत सरकार का रुख फिलहाल स्पष्ट है कि वह मुक्त व्यापार समझौते के लाभों को बरकरार रखना चाहती है, लेकिन राष्ट्रीय आर्थिक हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि यदि ब्रिटेन वास्तव में भारत के साथ दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी चाहता है तो उसे ऐसी नीतियों से बचना होगा जो भारतीय उद्योगों और निर्यातकों के लिए नुकसानदायक साबित हों।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में होने वाली उच्चस्तरीय वार्ता दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों की दिशा तय कर सकती है। यदि कोई संतुलित समाधान निकलता है तो एफटीए दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़ा अवसर बन सकता है, लेकिन यदि मतभेद बढ़ते हैं तो यह समझौता लागू होने से पहले ही गंभीर विवादों में घिर सकता है।
नई दिल्ली और लंदन दोनों की निगाहें 2 जून की बैठक पर टिकी हैं। यह बैठक केवल स्टील और कार्बन टैक्स का विवाद सुलझाने के लिए नहीं, बल्कि भारत-यूके आर्थिक साझेदारी के भविष्य को तय करने वाली महत्वपूर्ण वार्ता के रूप में देखी जा रही है।




