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पकोड़े से पेट्रोल तक: महंगाई की मार, मुनाफे की बहार और आम आदमी की हार

ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 मई 2026

भारत में महंगाई को अक्सर वैश्विक संकटों, युद्धों और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं का परिणाम बताया जाता है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज देश में बढ़ती कीमतों के पीछे केवल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां नहीं, बल्कि ईंधन करों, मूल्य निर्धारण नीतियों, कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी और स्थिर होती आय का भी बड़ा योगदान है।

भारत की अर्थव्यवस्था पेट्रोलियम और गैस पर अत्यधिक निर्भर है। ऐसे में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी केवल वाहन चलाने की लागत नहीं बढ़ाती, बल्कि पूरे बाजार में महंगाई की श्रृंखला शुरू कर देती है। परिवहन महंगा होता है, खाद्य पदार्थों की लागत बढ़ती है, छोटे कारोबारियों का खर्च बढ़ता है और अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ता है।

आज एक साधारण पकोड़ा बेचने वाला भी शिकायत करता है कि गैस, तेल, आटा, सब्जियां और परिवहन—सब कुछ महंगा हो गया है। नतीजा यह है कि जो पकोड़ा कुछ वर्ष पहले 10 रुपये में मिलता था, उसकी कीमत में भारी वृद्धि हो चुकी है। यही कहानी देश के लाखों छोटे व्यवसायों की भी है।

सरकार ने पिछले वर्षों में पेट्रोलियम उत्पादों पर करों और उपकरों के माध्यम से भारी राजस्व अर्जित किया है। आलोचकों का तर्क है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई गिरावट का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जाता, तो महंगाई का दबाव काफी कम हो सकता था। इसके बजाय ईंधन की ऊंची कीमतों ने अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को प्रभावित किया।

दिलचस्प बात यह है कि जहां आम नागरिक बढ़ती कीमतों से जूझ रहा है, वहीं कई बड़े कॉर्पोरेट समूहों के मुनाफे रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे हैं। अर्थशास्त्रियों ने इस प्रवृत्ति को “ग्रीडफ्लेशन” यानी मुनाफाखोरी आधारित महंगाई का नाम दिया है। इसका अर्थ है कि कुछ कंपनियां बढ़ी हुई लागत से कहीं अधिक कीमतें बढ़ाकर अपने लाभांश में वृद्धि करती हैं।

महामारी के बाद के वर्षों में हजारों सूचीबद्ध कंपनियों के मुनाफे ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गए, जबकि आम कर्मचारियों की आय उसी गति से नहीं बढ़ी। कई क्षेत्रों में मजदूरी लगभग स्थिर रही, लेकिन उत्पादों और सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। इससे आय और खर्च के बीच का अंतर और चौड़ा हो गया।

शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। निजी स्कूलों की फीस, कोचिंग संस्थानों का खर्च और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत तेजी से बढ़ी है। सरकारी स्कूलों के विलय या बंद होने से कई परिवार निजी शिक्षा की ओर धकेले गए हैं, जिससे घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

ऊर्जा नीति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल एक विकल्प पर निर्भर रहने के बजाय बहु-ईंधन नीति की आवश्यकता है। ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरणीय संतुलन और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन स्थापित किए बिना दीर्घकालिक समाधान संभव नहीं होगा।

महंगाई केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है। यह उस परिवार की कहानी है जो रसोई का बजट घटाने को मजबूर है, उस छोटे व्यापारी की समस्या है जिसकी लागत बढ़ती जा रही है, और उस युवा की चिंता है जिसकी आय जीवन-यापन की बढ़ती कीमतों के मुकाबले पीछे छूट रही है।

भारत को केवल अल्पकालिक राहत उपायों की नहीं, बल्कि ईंधन करों, ऊर्जा नीति, बाजार प्रतिस्पर्धा, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र की कीमतों तथा उपभोक्ता संरक्षण से जुड़ी व्यापक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। जब तक मूल्य निर्धारण और कर व्यवस्था में पारदर्शिता तथा संतुलन नहीं आएगा, तब तक महंगाई का बोझ आम नागरिक के कंधों पर ही बना रहेगा।

आर्थिक विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ आम नागरिक तक पहुंचे। यदि कॉर्पोरेट मुनाफे बढ़ते रहें और नागरिकों की क्रय शक्ति घटती जाए, तो विकास के आंकड़े भले चमकते दिखाई दें, लेकिन आम आदमी की जिंदगी लगातार कठिन होती जाएगी।

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