बिजनेस / अंतरराष्ट्रीय व्यापार | सुनील कुमार सिंह | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026
भारत ने ब्रिटेन के नए स्टील आयात नियमों पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इस मुद्दे पर भारत को तुर्की, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्राजील, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों का भी समर्थन मिला है। सभी देशों ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में ब्रिटेन के प्रस्तावित स्टील सुरक्षा उपायों पर चिंता जताई है।
ब्रिटेन 1 जुलाई 2026 से स्टील आयात पर नए प्रतिबंध लागू करने जा रहा है। इसके तहत बिना टैरिफ वाले स्टील आयात कोटा में लगभग 60 प्रतिशत तक कटौती की जाएगी। तय सीमा से अधिक आयात पर 50 प्रतिशत तक भारी टैरिफ लगाया जाएगा। ब्रिटेन का कहना है कि यह कदम घरेलू स्टील उद्योग को बचाने के लिए उठाया जा रहा है।
हालांकि भारत और अन्य देशों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक व्यापार नियमों के खिलाफ है और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। WTO की “काउंसिल फॉर ट्रेड इन गुड्स” की बैठक में भारत ने ब्रिटेन से ऐसे समाधान तलाशने की अपील की जो व्यापार पर कम से कम रोक लगाने वाले हों।
यह विवाद भारत और ब्रिटेन के बीच हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) के लागू होने में भी बड़ी बाधा बनता दिखाई दे रहा है। 24 जुलाई 2025 को दोनों देशों के बीच यह समझौता साइन हुआ था और उम्मीद थी कि इसे इसी महीने लागू कर दिया जाएगा। लेकिन ब्रिटेन के नए स्टील नियमों ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है।
सूत्रों के अनुसार, भारत और ब्रिटेन के बीच लगातार बातचीत जारी है ताकि कोई “रचनात्मक समाधान” निकाला जा सके। भारत का कहना है कि मुक्त व्यापार समझौते का उद्देश्य व्यापार बढ़ाना है, न कि नए प्रतिबंध लगाना।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रिटेन अपने फैसले पर कायम रहता है, तो भारतीय स्टील निर्यातकों को बड़ा नुकसान हो सकता है। भारत पहले से ही वैश्विक बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ऊंची लागत की चुनौती झेल रहा है। ऐसे में ब्रिटेन का यह कदम भारतीय उद्योग के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा करेगा।
तुर्की और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े स्टील निर्यातक देशों का भारत के साथ खड़ा होना इस मुद्दे को और गंभीर बना रहा है। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि ब्रिटेन के फैसले से केवल भारत ही नहीं बल्कि कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी।
अब निगाहें भारत-ब्रिटेन वार्ता और WTO की आगामी चर्चाओं पर टिकी हैं। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो CETA समझौते के लागू होने में और देरी हो सकती है, जिसका असर दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर पड़ना तय माना जा रहा है।




