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परिसीमन पर दक्षिण बनाम केंद्र बहस तेज, चिदंबरम और शर्मिला ने नारा लोकेश को घेरा

राजनीति / आंध्र प्रदेश | शीतांशु रमन | ABC NATIONAL NEWS | विजयवाड़ा | 22 मई 2026

लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) को लेकर दक्षिण भारत की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री और टीडीपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नारा लोकेश के बयान के बाद कांग्रेस नेताओं पी. चिदंबरम और आंध्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वाई.एस. शर्मिला ने उन पर तीखा हमला बोला है। दोनों नेताओं ने कहा कि दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व का सवाल केवल सीटें बढ़ाने से हल नहीं होगा और नारा लोकेश को “गणित दोबारा समझने” की जरूरत है।

दरअसल, द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में नारा लोकेश ने कहा था कि कांग्रेस परिसीमन विधेयक का विरोध कर रही है, जबकि दक्षिणी राज्यों को भविष्य में संसद में अपनी राजनीतिक ताकत घटने का खतरा है। उन्होंने दावा किया कि 2026 के बाद जनगणना के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।

लोकेश के इस बयान के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केवल लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ा देने से दक्षिण भारत की “सापेक्ष राजनीतिक ताकत” कम होने का खतरा खत्म नहीं होगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 81 का हवाला देते हुए कहा कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा होने पर दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी स्वाभाविक रूप से घट सकती है।

इसके बाद आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC) अध्यक्ष वाई.एस. शर्मिला ने भी नारा लोकेश पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है और लोकेश “जहां कोई भ्रम नहीं है, वहां भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।” शर्मिला ने कहा कि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण नीति को सफलतापूर्वक लागू किया है और अब उन्हें इसकी सजा नहीं मिलनी चाहिए।

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शर्मिला ने कहा कि कांग्रेस लंबे समय से यह मांग करती रही है कि परिसीमन ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे संसद में दक्षिण भारत की आवाज कमजोर हो जाए। उन्होंने कहा कि जब तक मजबूत संवैधानिक गारंटी नहीं दी जाती, तब तक कांग्रेस ऐसे किसी भी परिसीमन का समर्थन नहीं करेगी जो दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रभाव को कम करे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा विषय बनने जा रहा है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, इसलिए उन्हें कम सीटों या कम राजनीतिक ताकत के रूप में “दंडित” नहीं किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि केवल जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। इससे दक्षिण भारत की संसद में हिस्सेदारी कम हो सकती है। यही कारण है कि तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में इस मुद्दे को लेकर चिंता बढ़ रही है।

वहीं टीडीपी और कुछ अन्य दलों का मानना है कि परिसीमन पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए ताकि सभी राज्यों के हित सुरक्षित रह सकें। नारा लोकेश का कहना है कि दक्षिण भारत के हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलों को एकजुट होना चाहिए।

इस पूरे विवाद ने दक्षिण बनाम उत्तर की राजनीतिक बहस को फिर हवा दे दी है। आने वाले समय में परिसीमन का मुद्दा संसद से लेकर राज्यों की राजनीति तक बड़ा चुनावी और संवैधानिक मुद्दा बन सकता है।

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राजनीतिक जानकारों का मानना है कि केंद्र सरकार को इस विषय पर सभी राज्यों के साथ व्यापक संवाद करना होगा, क्योंकि यह केवल सीटों का मामला नहीं बल्कि संघीय ढांचे, राजनीतिक संतुलन और राज्यों के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय है।

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