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स्वदेशी ‘वायु अस्त्र-1’ ने दिखाया दम: पोखरण और उत्तराखंड में सफल परीक्षण, भारतीय सेना को मिली नई स्ट्राइक क्षमता

रक्षा / स्वदेशी तकनीक / भारतीय सेना | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026

भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक को एक और बड़ी सफलता मिली है। पुणे स्थित रक्षा प्रौद्योगिकी कंपनी Nibe Limited ने अपने स्वदेशी लोइटरिंग म्यूनिशन सिस्टम “वायु अस्त्र-1” के उच्च स्तरीय परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। राजस्थान के पोखरण फायरिंग रेंज और उत्तराखंड के जोशीमठ (मलारी) जैसे कठिन इलाकों में किए गए इन परीक्षणों को भारतीय सेना के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। खास बात यह है कि कंपनी ने यह प्रदर्शन “नो-कॉस्ट, नो-कमिटमेंट” आधार पर किया, यानी सेना के सामने सिस्टम की वास्तविक क्षमता को बिना किसी पूर्व अनुबंध के प्रदर्शित किया गया।

कंपनी के अनुसार 18 और 19 अप्रैल को पोखरण रेंज में “वायु अस्त्र-1” के एंटी-पर्सनल वेरिएंट का परीक्षण किया गया। 10 किलोग्राम वॉरहेड से लैस इस लोइटरिंग म्यूनिशन ने लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद लक्ष्य को पहली ही कोशिश में बेहद सटीकता के साथ निशाना बनाया। परीक्षण के दौरान इसका “सर्कुलर एरर प्रोबेबल” यानी CEP एक मीटर से भी कम दर्ज किया गया, जो किसी भी आधुनिक स्ट्राइक सिस्टम के लिए अत्यंत उच्च स्तर की सटीकता मानी जाती है। इसके अलावा सिस्टम ने “अबॉर्ट अटैक” और “री-अटैक” क्षमता का भी सफल प्रदर्शन किया, जिसका अर्थ है कि लक्ष्य बदलने या हमले को बीच में रोकने जैसी सामरिक जरूरतों के अनुसार यह हथियार खुद को अनुकूलित कर सकता है।

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि “वायु अस्त्र-1” भारत की बढ़ती ड्रोन और लोइटरिंग म्यूनिशन क्षमता का बड़ा संकेत है। आधुनिक युद्धों में ऐसे हथियारों की भूमिका तेजी से बढ़ी है, जहां पारंपरिक मिसाइलों की तुलना में अधिक लचीलापन, कम लागत और रियल-टाइम टारगेट एंगेजमेंट की जरूरत होती है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संघर्ष और हालिया सीमा तनावों ने यह साबित किया है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन, स्मार्ट म्यूनिशन और AI-सक्षम स्ट्राइक सिस्टम निर्णायक भूमिका निभाने वाले हैं। ऐसे समय में भारत का स्वदेशी रूप से इस तकनीक को विकसित करना सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हुए परीक्षणों को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत की उत्तरी सीमाओं पर तैनात सेना को अत्यधिक कठिन मौसम और पहाड़ी परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। लद्दाख और अरुणाचल जैसे इलाकों में तेजी से बदलती सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे हथियारों की जरूरत और बढ़ गई है जो कम समय में सटीक हमले कर सकें और दुश्मन की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रख सकें। रक्षा विश्लेषकों के अनुसार यदि यह प्रणाली बड़े पैमाने पर सेना में शामिल होती है, तो भारतीय सेना की सामरिक स्ट्राइक क्षमता और अधिक मजबूत हो सकती है।

यह उपलब्धि “आत्मनिर्भर भारत” और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण की नीति को भी नई मजबूती देती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रक्षा आयात पर निर्भरता कम करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया है। DRDO के साथ-साथ अब निजी भारतीय कंपनियां भी अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियां विकसित करने लगी हैं। “वायु अस्त्र-1” का सफल प्रदर्शन इसी बदलते रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत माना जा रहा है, जहां भारतीय निजी कंपनियां केवल सप्लायर नहीं, बल्कि रणनीतिक तकनीकी भागीदार के रूप में उभर रही हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि हाल के महीनों में भारत ने स्वदेशी रक्षा तकनीकों के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण प्रगति दर्ज की हैं। लंबी दूरी की रॉकेट प्रणालियों, प्रिसिजन मिसाइलों, एंटी-ड्रोन सिस्टम और हाई-एल्टीट्यूड सर्विलांस तकनीकों के सफल परीक्षणों ने यह संकेत दिया है कि भारत अब केवल रक्षा उपकरण खरीदने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक रक्षा तकनीक बाजार में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

फिलहाल “वायु अस्त्र-1” के सफल परीक्षण ने भारतीय रक्षा क्षेत्र में नई उम्मीद पैदा की है। अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि भारतीय सेना इस प्रणाली को भविष्य की सामरिक जरूरतों में किस तरह शामिल करती है और क्या यह तकनीक आने वाले वर्षों में भारत की सीमाई सुरक्षा और युद्धक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन पाती है।

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