अंतरराष्ट्रीय | शीतांशु रमन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 14 मई 2026
नई दिल्ली में गुरुवार से शुरू हुई BRICS देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक ऐसे समय आयोजित हो रही है जब पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध, होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और अमेरिका-चीन की बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक राजनीति को अस्थिर बना दिया है। भारत की मेजबानी में आयोजित यह दो दिवसीय बैठक सितंबर 2026 में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन की तैयारी मानी जा रही है, लेकिन मौजूदा हालात में ईरान युद्ध और ऊर्जा संकट इस सम्मेलन की सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरे हैं। भारत के विदेश मंत्री S Jaishankar ने उद्घाटन भाषण में अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों में “सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही” सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो सीधे तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव की ओर संकेत माना गया।
बैठक में ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने अमेरिका और इजरायल पर “गैरकानूनी आक्रामकता” का आरोप लगाते हुए BRICS देशों से संयुक्त रूप से इसकी निंदा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की “श्रेष्ठता की मानसिकता” को ग्लोबल साउथ के देशों को मिलकर चुनौती देनी होगी। अराघची ने भारत समेत कई सदस्य देशों के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें भी कीं। माना जा रहा है कि ईरान इस मंच का उपयोग अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने और होर्मुज संकट पर अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए कर रहा है।
BRICS समूह, जिसमें Brazil, Russia, India, China और South Africa के साथ अब Egypt, Ethiopia, Iran, UAE और Indonesia जैसे नए सदस्य भी शामिल हैं, इस समय आंतरिक मतभेदों से भी जूझ रहा है। सबसे बड़ा तनाव ईरान और UAE के बीच दिखाई दे रहा है। अप्रैल में नई दिल्ली में हुई BRICS डिप्टी फॉरेन मिनिस्टर्स बैठक भी संयुक्त बयान जारी किए बिना समाप्त हो गई थी, क्योंकि ईरान और UAE के बीच अमेरिका-इजरायल युद्ध को लेकर सहमति नहीं बन सकी थी। अब एक बार फिर यह आशंका जताई जा रही है कि यदि सदस्य देशों के बीच मतभेद बने रहे तो इस बार भी साझा घोषणापत्र जारी करना मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping की बीजिंग में चल रही उच्चस्तरीय वार्ता ने BRICS बैठक की अहमियत और बढ़ा दी है। अमेरिकी प्रशासन चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डालकर होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलने में मदद करे, जबकि चीन सार्वजनिक रूप से कूटनीतिक समाधान और संतुलित रुख की बात कर रहा है। चीन के विदेश मंत्री Wang Yi ट्रंप-शी वार्ता के कारण नई दिल्ली नहीं पहुंचे और उनकी जगह भारत में चीनी राजदूत Xu Feihong BRICS बैठक में हिस्सा ले रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट का असर BRICS देशों की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है। भारत और चीन की ऊर्जा जरूरतें खाड़ी देशों के तेल पर काफी हद तक निर्भर हैं, जबकि Saudi Arabia और UAE जैसे देश इसी मार्ग से तेल निर्यात करते हैं। युद्ध और नौसैनिक तनाव के कारण वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बैठक केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि आने वाले महीनों में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाले कई बड़े मुद्दों की दिशा तय कर सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट, ईरान युद्ध, अमेरिका-चीन तनाव और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विषय अब BRICS एजेंडे के केंद्र में आ चुके हैं। ऐसे में नई दिल्ली में हो रही यह बैठक केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की नई तस्वीर भी पेश कर रही है।




