राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | चेन्नई | 14 मई 2026
तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री J. Jayalalithaa की पार्टी All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam अब खुलकर दो धड़ों में बंटती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर जारी सत्ता संघर्ष ने AIADMK को गंभीर राजनीतिक संकट में डाल दिया है और अब सवाल उठने लगे हैं कि क्या तमिलनाडु में भी महाराष्ट्र की तरह शिवसेना और NCP जैसा विभाजन देखने को मिलेगा।
AIADMK के महासचिव Edappadi K. Palaniswami (EPS) और वरिष्ठ नेता C. V. Shanmugam के बीच बढ़ते टकराव ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया है। रिपोर्ट्स के अनुसार विधानसभा में EPS गुट के पास लगभग 22 विधायक हैं, जबकि सीवी शनमुगम के नेतृत्व वाले बागी खेमे के साथ करीब 25 विधायक बताए जा रहे हैं। यही कारण है कि अब यह विवाद केवल संगठनात्मक लड़ाई नहीं, बल्कि विधायकों की संख्या और असली राजनीतिक नियंत्रण की लड़ाई बन चुका है।
यह संकट उस समय गहराया जब तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री C. Joseph Vijay की सरकार के विश्वास मत के दौरान AIADMK के एक बड़े गुट ने पार्टी लाइन से हटकर सरकार के समर्थन में मतदान किया। इसके बाद EPS नेतृत्व ने बागी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करते हुए कई वरिष्ठ नेताओं को पार्टी पदों से हटा दिया। लेकिन बागी गुट ने इस फैसले को ही चुनौती दे दी।
सीवी शनमुगम ने साफ कहा है कि EPS को उन्हें हटाने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा नेतृत्व की गलत रणनीतियों के कारण पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है। शनमुगम गुट का दावा है कि पार्टी के भीतर असली बहुमत उनके साथ है और भविष्य में वे AIADMK पर अपना दावा पेश कर सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति काफी हद तक महाराष्ट्र में शिवसेना और NCP में हुए विभाजन जैसी दिखाई दे रही है। महाराष्ट्र में पहले शिवसेना दो धड़ों में बंटी और बाद में चुनाव आयोग ने विधायक संख्या और संगठनात्मक समर्थन के आधार पर एकनाथ शिंदे गुट को असली पार्टी का दर्जा दिया। इसी तरह NCP में अजित पवार और शरद पवार गुट के बीच भी लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई चली।
अब तमिलनाडु में भी वही सवाल उठ रहा है — AIADMK का “असली” नियंत्रण किसके पास रहेगा? यदि दोनों गुट अपने-अपने विधायकों और संगठनात्मक समर्थन का दावा करते हैं, तो मामला चुनाव आयोग और अदालत तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पार्टी के चुनाव चिन्ह “दो पत्तियां” पर भी विवाद खड़ा हो सकता है। AIADMK का यह चुनाव चिन्ह तमिलनाडु की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और जयललिता की राजनीतिक पहचान से जुड़ा रहा है। यदि विवाद गहराता है, तो चुनाव आयोग को तय करना पड़ सकता है कि असली AIADMK कौन-सा गुट है।
तमिलनाडु की राजनीति में AIADMK लंबे समय तक DMK की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी रही है। लेकिन जयललिता के निधन के बाद पार्टी लगातार नेतृत्व संकट और अंदरूनी संघर्ष से जूझती रही है। पहले ओ. पन्नीरसेल्वम और EPS के बीच सत्ता संघर्ष हुआ, फिर पार्टी संगठन पर नियंत्रण को लेकर विवाद चला। अब मौजूदा बगावत ने पार्टी की एकजुटता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि AIADMK का विभाजन स्थायी रूप लेता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा सत्तारूढ़ TVK और DMK को मिल सकता है। विपक्ष के कमजोर होने से तमिलनाडु की राजनीति का पूरा समीकरण बदल सकता है।
इस बीच AIADMK कार्यकर्ताओं में भी भ्रम की स्थिति है। एक तरफ EPS खुद को पार्टी का वैध नेता बता रहे हैं, वहीं बागी गुट दावा कर रहा है कि पार्टी का बड़ा हिस्सा उनके साथ है। आने वाले दिनों में विधायक दल, पार्टी मुख्यालय और चुनाव चिन्ह को लेकर संघर्ष और तेज हो सकता है। तमिलनाडु की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या AIADMK खुद को टूटने से बचा पाएगी या फिर महाराष्ट्र की तरह यहां भी एक ऐतिहासिक क्षेत्रीय दल स्थायी विभाजन का शिकार हो जाएगा?




