अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 10 मई 2026
अमेरिका में भले ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेट लगभग हर मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई देते हों, लेकिन एक ऐसा मुद्दा सामने आया है जिस पर दोनों दलों के समर्थकों की सोच लगभग एक जैसी है — और वह है राजनीति में बढ़ता पैसा।
POLITICO और Public First के नए सर्वे के मुताबिक करीब 72 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों का मानना है कि अमेरिकी राजनीति में जरूरत से ज्यादा पैसा आ चुका है। सिर्फ 5 प्रतिशत लोगों ने इससे असहमति जताई। यानी बड़ी संख्या में अमेरिकी अब मानने लगे हैं कि चुनाव और राजनीति पर अमीर लोगों, कॉर्पोरेट समूहों और बड़े हित समूहों का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
सर्वे में सबसे बड़ी चिंता यह सामने आई कि आम लोग महसूस कर रहे हैं कि चुनाव अब सिर्फ विचारों या जनता के समर्थन से नहीं, बल्कि पैसों की ताकत से प्रभावित हो रहे हैं। करीब 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि पैसा सीधे चुनावी नतीजे “खरीद” सकता है, जबकि 34 प्रतिशत का मानना है कि पैसा चुनावों को काफी हद तक प्रभावित जरूर करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में चुनावी खर्च लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिप्टोकरेंसी और नई टेक कंपनियों से जुड़े बड़े कारोबारी समूह अब खुलकर चुनावी राजनीति में पैसा लगा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 2026 के मिडटर्म चुनावों में सिर्फ विज्ञापन पर ही लगभग 10.8 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि अमेरिकी नागरिक अरबपतियों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से बेहद परेशान हैं। लगभग 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अरबपतियों का अमेरिकी राजनीति पर जरूरत से ज्यादा असर है। दिलचस्प बात यह रही कि इस मुद्दे पर डेमोक्रेट समर्थकों की चिंता ज्यादा मजबूत दिखाई दी, लेकिन रिपब्लिकन समर्थकों का बड़ा वर्ग भी इससे सहमत नजर आया।
अमेरिका में “स्पेशल इंटरेस्ट ग्रुप्स” यानी खास आर्थिक या राजनीतिक हित वाले समूहों के प्रभाव को लेकर भी लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। सर्वे में 53 प्रतिशत लोगों ने माना कि ऐसे समूहों का पैसा लोकतंत्र को भ्रष्ट बना रहा है और उस पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए। यहां तक कि ट्रंप समर्थकों का भी बड़ा हिस्सा इस राय से सहमत दिखा।
सर्वे का एक और अहम पहलू यह रहा कि बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक खुद को राजनीति में कमजोर महसूस कर रहे हैं। करीब आधे लोगों ने कहा कि वोटरों के पास पर्याप्त ताकत नहीं बची है, जबकि बड़े दानदाता और लॉबी समूह ज्यादा प्रभावशाली हो गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सर्वे अमेरिका के लोकतांत्रिक ढांचे को लेकर बढ़ती बेचैनी का संकेत है। लोगों को लगने लगा है कि चुनावों में उम्मीदवारों की लोकप्रियता से ज्यादा उनकी फंडिंग मायने रखती है। खासकर टीवी विज्ञापन, सोशल मीडिया प्रचार और बड़े चुनावी आयोजनों में भारी पैसा झोंके जाने से यह धारणा और मजबूत हुई है।
हालांकि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट समर्थकों के बीच कुछ मतभेद भी दिखे। डेमोक्रेट समर्थकों का बड़ा हिस्सा मानता है कि पैसा सीधे चुनाव “खरीद” सकता है, जबकि कई रिपब्लिकन समर्थक इसे प्रभाव का जरिया तो मानते हैं लेकिन पूरी तरह चुनाव खरीदने की बात से थोड़ा पीछे दिखाई दिए।
फिर भी एक बात साफ है — अमेरिका में राजनीतिक ध्रुवीकरण चाहे जितना बढ़ गया हो, लेकिन राजनीति में बढ़ते पैसे को लेकर जनता की चिंता अब दोनों दलों की साझा चिंता बनती जा रही है।



